राज्य के नीति-निदेशक तत्व व महत्वपूर्ण वाद
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Key Points
- भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 के तहत राज्य के नीति-निदेशक तत्वों (DPSP) का उल्लेख है।
- अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों के संगठन से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 44 पूरे देश के लिए एक समान सिविल संहिता का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 50 के अंतर्गत कार्यपालिका से न्यायपालिका को पृथक करने का महत्वपूर्ण निर्देश दिया गया है।
- शंकरी प्रसाद वाद में संसद को मूल अधिकारों में संशोधन की शक्ति दी गई थी, जिसे 1967 के गोलकनाथ वाद में उलट दिया गया।
- गोलकनाथ वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने 'भविष्य लक्षी विधि का सिद्धांत' (Principle of Prospective Over Ruling) प्रतिपादित किया था।
- इंदिरा साहनी वाद (मण्डल वाद) में न्यायालय ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% निर्धारित की थी।
- इंदिरा साहनी वाद के तहत ही पिछड़ी जातियों के समृद्ध वर्ग को आरक्षण से बाहर रखने के लिए 'क्रीमी-लेयर' का सिद्धांत लागू किया गया।
राज्य के नीति-निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy)
राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का वर्णन भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36-51 के मध्य किया गया है। राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का तात्पर्य भारतीय संविधान में उन सिद्धान्तों या आदेशों से है, जो राज्य की नीति का निर्देशन करते हैं और इस बात की ओर संकेत करते हैं कि राज्य की नीति क्या होनी चाहिए। ये तत्व सदैव सरकार का मार्गदर्शन करते हैं।
संविधान में नीति-निदेशक तत्वों का उल्लेख इसलिए किया गया है, क्योंकि ये तत्व राज्य के आदर्शों को स्पष्ट करते हैं। चाहे किसी भी दल की सरकार बने, किंतु वह संविधान में उल्लिखित इन तत्वों के अनुसार निर्धारित नीतियों पर ही शासन चलाती है।
नीति-निदेशक तत्वों के महत्वपूर्ण अनुच्छेद (Quick Reference Table)
भाग 4 के अंतर्गत आने वाले प्रमुख परीक्षा-उपयोगी अनुच्छेदों का विवरण इस प्रकार है:
| अनुच्छेद | संवैधानिक प्रावधान / विषय-वस्तु |
|---|---|
| अनुच्छेद 38 | राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा। |
| अनुच्छेद 39 क | समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करना। |
| अनुच्छेद 40 | ग्राम पंचायतों का संगठन (गांधीवादी आदर्श)। |
| अनुच्छेद 41 | कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार। |
| अनुच्छेद 42 | काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबन्ध। |
| अनुच्छेद 43 | कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि का प्रावधान। |
| अनुच्छेद 44 | नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code)। |
| अनुच्छेद 45 | बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबन्ध। |
| अनुच्छेद 46 | अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों की अभिवृद्धि। |
| अनुच्छेद 47 | पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्त्तव्य। |
| अनुच्छेद 48 | कृषि और पशुपालन का संगठन। |
| अनुच्छेद 48 क | पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा। |
| अनुच्छेद 49 | राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण। |
| अनुच्छेद 50 | कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण (Separation of Judiciary from Executive)। |
| अनुच्छेद 51 | अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि। |
मूल अधिकार एवं निदेशक तत्वों में विवादित पक्ष तथा प्रमुख वाद
संविधान लागू होने के बाद से ही मूल अधिकारों (भाग 3) और नीति-निदेशक तत्वों (भाग 4) की सर्वोच्चता को लेकर न्यायपालिका और संसद के बीच विवाद की स्थिति रही है, जिसे समझने के लिए प्रमुख वादों का अध्ययन आवश्यक है:
1. शंकरी प्रसाद वाद
- इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद-13(2) में वर्णित 'विधि' शब्द के अंतर्गत संविधान संशोधन विधि (अनुच्छेद 368) शामिल नहीं है।
- न्यायपालिका के अनुसार, सामान्य विधि (Ordinary Law) व संशोधन विधि (Constitutional Amendment Law) में स्पष्ट अंतर है।
- उपर्युक्त निर्णय से यह अभिप्राय था कि संसद सामान्य विधि के द्वारा मूल अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती, बल्कि संविधान संशोधन के द्वारा मूल अधिकारों को छीन या बदल सकती है।
- सम्पत्ति का अधिकार: सम्पत्ति का अधिकार पहले मूल अधिकार था, जिसे बाद में जमींदारी उन्मूलन कानून द्वारा मूल अधिकारों की श्रेणी से हटाकर कानूनी अधिकार (Legal Right) बना दिया गया।
2. गोलकनाथ वाद (1967)
- इस वाद में न्यायपालिका ने अपने पुराने 'शंकरी प्रसाद वाद' के निर्णय को उलट (परिवर्तित कर) दिया।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद-13(2) में वर्णित 'विधि' में संशोधन विधि भी सम्मिलित है।
- अर्थात् न्यायपालिका ने सामान्य विधि और संशोधन विधि के अंतर को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया।
- इसके अनुसार, अब संसद के द्वारा सामान्य विधि अथवा संशोधन विधि किसी भी माध्यम से मूल अधिकारों को छीना या कम नहीं किया जा सकता है।
भविष्य लक्षी विधि का सिद्धांत (Principle of Prospective Over Ruling)
गोलकनाथ वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भविष्य लक्षी विधि का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। इसका मुख्य अभिप्राय यह है कि गोलकनाथ वाद के निर्णय के बाद से भविष्य में मूल अधिकारों में किसी भी प्रकार का ऐसा संशोधन संभव नहीं है जो उन्हें कम करता हो।
3. इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद (मण्डल वाद)
ओबीसी (OBC) आरक्षण और आरक्षण की सीमाओं को लेकर यह ऐतिहासिक वाद माना जाता है, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए:
- आरक्षण का आधार: उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारतीय संविधान में आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक है, आर्थिक नहीं। इसलिए, तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार द्वारा आर्थिक रूप से पिछड़े उच्च वर्ग को दिए गए 10% आरक्षण को उस समय अवैध करार दे दिया गया था।
- 50% की अधिकतम सीमा: न्यायालय ने कहा कि भारत में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके लिए न्यायालय ने अनुच्छेद-335 का सन्दर्भ दिया, जिसमें यह उल्लेखित है कि अनुसूचित जाति एवं जनजातियों को आरक्षण प्रदान करते समय सरकारी सेवाओं की कार्य-कुशलता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
- क्रीमी-लेयर (Creamy Layer) का सिद्धांत: पिछड़ी जातियों में सम्मिलित सभी लोग पिछड़ी जातियों के लाभों में शामिल नहीं होंगे, क्योंकि इन जातियों का जो वर्ग सामाजिक-शैक्षणिक रूप से उत्थान कर चुका है, उन्हें लोकप्रिय रूप में 'क्रीमी-लेयर' नाम दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने क्रीमी-लेयर की पहचान करने के लिए एक विशेष आयोग के गठन का निर्देश दिया।
- कैरी-फॉरवर्ड का नियम (Rule of Carry Forward): उच्चतम न्यायालय ने नियुक्तियों में कैरी-फॉरवर्ड के नियम को स्वीकार कर लिया। इसके नियम के अनुसार, यदि आरक्षित सीटें किसी वर्ष खाली रह जाती हैं, तो उन्हें अगले साल भरा जाएगा (बैकलॉग वैकेंसी), परंतु इसमें भी किसी भी वर्ष 50% की अधिकतम आरक्षण सीमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
- आरक्षण की 50% सीमा प्रत्येक वर्ष की नौकरियों के लिए लागू होगी न कि नौकरियों की कुल संख्या के लिए।
- विशेषज्ञता के कुछ विशिष्ट पदों (जैसे तकनीकी या वैज्ञानिक पद) के लिए आरक्षण का पालन नहीं किया जाएगा।
- वर्तमान स्थिति: उच्चतम न्यायालय ने अब 50% के अतिरिक्त 3% आरक्षण विकलांग व्यक्तियों के लिए देने पर सहमति दी है। अपवाद स्वरूप तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है, जहाँ इस 50% की सीमा से अधिक आरक्षण कानूनी रूप से विद्यमान है।