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इतिहास के स्रोत: विदेशी यात्रियों के विवरण व पुरातात्विक साक्ष्य |

1 min read 47 views 06 Jul 2026 Indian GK
यूनानी, चीनी व अरबी यात्रियों के ऐतिहासिक वृत्तांत तथा प्राचीन मुद्राओं, सिक्कों और पुरातात्विक साक्ष्यों का सम्पूर्ण विवरण जो RPSC, RAS परीक्षाओं हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Key Points
  • हेरोडोटस को 'इतिहास का पिता' कहा जाता है, जिन्होंने अपनी पुस्तक 'हिस्टोरिका' में भारत-फारस संबंधों का वर्णन किया।
  • मेगास्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था और उसकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम 'इंडिका' है।
  • चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय आया था, जबकि हेनसांग हर्षवर्धन के काल में आया था और उसका यात्रा वृत्तांत 'सी-यू-की' कहलाता है।
  • एशिया माइनर से प्राप्त 1400 ई.पू. के बोगजkoi अभिलेख में वैदिक देवताओं इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य का उल्लेख मिलता है।
  • रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से प्रसिद्ध सुदर्शन झील के निर्माण और इतिहास के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलती है।

विदेशी यात्रियों के विवरण एवं वृत्तांत

प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में विदेशी यात्रियों और लेखकों के विवरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हें मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जाता है— यूनान एवं रोम के लेखक, चीनी यात्री और अरब यात्री।

1. यूनान एवं रोम के लेखकों का विवरण

  • हेरोडोटस — इन्हें 'इतिहास का पिता' कहा जाता है। इन्होंने अपनी पुस्तक 'हिस्टोरिका' में 5वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व के भारत-फारस संबंधों का जीवंत वर्णन किया है।
  • मेगास्थनीज — यह सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। इसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'इंडिका' में मौर्ययुगीन समाज एवं संस्कृति का वर्णन किया है।
  • डायमेकस व डायोनिसियस — डायमेकस सीरियाई नरेश एन्टियोकस प्रथम का राजदूत था जो बिन्दुसार के दरबार में आया। डायोनिसियस मिस्र नरेश टॉल्मी द्वितीय फिलाडेल्फस का राजदूत था जो अशोक के दरबार में आया था।
  • टॉल्मी व प्लिनी — टॉल्मी ने लगभग 150 ई. के आस-पास 'भूगोल' नामक ग्रंथ की रचना की। प्लिनी ने प्रथम शताब्दी ईस्वी में 'नेचुरल हिस्टोरिका' नामक ग्रंथ लिखा जिसमें भारतीय पशुओं, पेड़-पौधों और खनिजों का विवरण है।

2. चीनी यात्रियों के वृत्तांत

  • फाह्यान — यह गुप्त नरेश चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375-415 ई.) के समय भारत आया था। इसने मध्यदेश के समाज एवं संस्कृति का वर्णन किया है तथा वहां की जनता को सुखी व समृद्ध बताया है। यह भारत में 12 वर्षों तक रहा।
  • हेनसांग (युवान च्वांग) — इसे 'युवा न्च्वांग' के नाम से भी जाना जाता है। यह हर्षवर्धन के समय लगभग 629 ई. में भारत आया और 16 वर्षों तक रहा। इसका यात्रा वृत्तांत 'सी-यू-की' के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है। इसकी जीवनी 'व्हीली' ने लिखी थी।
  • इत्सिंग — यह 7वीं शताब्दी के अंत में भारत आया था। इसने अपने विवरण में नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय के साथ-साथ तत्कालीन भारतीय दशाओं का उल्लेख किया है।

3. अरब यात्रियों के वृत्तांत

  • अलबरूनी — इसका पूरा नाम अबूरिहान मुहम्मद-इब्न-अहमद-अलबरूनी था। इसका जन्म 973 ई. में ख्वारिज्म (खीवा) में हुआ था। यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था और अरबी, फारसी व संस्कृत का प्रकांड विद्वान था।
  • इब्नखुर्दादब व अलमसूदी — इब्नखुर्दादब ने 9वीं शताब्दी के ग्रंथ 'किताबुल-मसालिक वल-ममालिक' में भारतीय समाज व व्यापारिक मार्गों का विवरण दिया। अलमसूदी ने अपने ग्रंथ 'मूरुजज जहब' में तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया।

पुरातात्विक संबंधी साक्ष्य: अभिलेख एवं मुद्राएं

पुरातत्व के अंतर्गत तीन प्रकार के साक्ष्य प्रमुख माने जाते हैं— अभिलेख, मुद्रा एवं स्मारक। अभिलेख पाषाण शिलाओं, स्तंभों, दीवारों, मुद्राओं एवं ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण किए जाते थे।

क्र.सं. अभिलेख का नाम शासक एवं अभिलेख की विशेषताएं
1 हाथीगुम्फा अभिलेख कलिंग राज खारवेल (तिथि रहित अभिलेख)
2 जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख रुद्रदामन (सुदर्शन झील के बारे में जानकारी)
3 नासिक अभिलेख गौतमी बलश्री (सातवाहनों की उपलब्धियाँ)
4 प्रयाग स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त (इसकी दिग्विजयों की जानकारी)

महत्वपूर्ण पुरातात्विक बिंदु

  • बोगजकोई अभिलेख (एशिया माइनर) — यह सबसे प्राचीन अभिलेख है जो लगभग 1400 ई.पू. का है। इसमें वैदिक देवता इन्द्र, मित्र, वरुण एवं नासत्य के नाम मिलते हैं।
  • आहत सिक्के (Punch Marked Coins) — भारत के प्राचीनतम सिक्के आठवीं शताब्दी ई.पू. के हैं जिन्हें 'कार्षापण', 'पुराण', 'धरण' या 'शतमान' कहा जाता था। सिक्कों पर लेख लिखवाने का कार्य सर्वप्रथम यवन शासकों ने किया।
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