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प्राचीन सभ्यताएँ: प्रागैतिहासिक काल व पाषाण युग के साक्ष्य

1 min read 45 views 06 Jul 2026 Indian GK
पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण एवं ताम्रपाषाण काल का वर्गीकरण, मानव विकास के साक्ष्य तथा राजस्थान की आहाड़ संस्कृति का विस्तृत ऐतिहासिक अध्ययन।
Key Points
  • भारत में पाषाण कालीन सभ्यता का अन्वेषण सर्वप्रथम 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने शुरू किया था।
  • मध्य प्रदेश की भीमबेटका गुफाओं से प्राचीन शैलचित्र मिले हैं, जिनकी खोज 1958 में बी.एस. वाकणकर ने की थी।
  • राजस्थान के बागोर (भीलवाड़ा) और मध्य प्रदेश के आदमगढ़ से पशुपालन के सबसे प्राचीन प्रामाणिक साक्ष्य मिले हैं।
  • नवपाषाण काल में मानव ने कृषि कार्य प्रारंभ किया, पहिए का आविष्कार किया और स्थाई रूप से बसना शुरू किया।
  • कश्मीर के बुर्जहोम नामक नवपाषाणिक स्थल से गर्त-आवास (गड्ढों वाले घर) और मालिक के साथ कुत्ते को दफनाने के साक्ष्य मिले हैं।
  • दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की आहाड़ संस्कृति को प्राचीन काल में 'ताम्बवती' कहा जाता था, जो एक प्रमुख ताम्रपाषाणिक ग्रामीण संस्कृति थी।

प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण

जिस काल के इतिहास का कोई लिखित विवरण नहीं मिलता, उसे प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है (जैसे- पाषाण काल)। इसे मुख्यतः तीन भागों में बांटा गया है— पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल तथा नव या उत्तर पाषाण काल।

1. पुरापाषाण काल (5,000,000 ई.पू. से 10,000 ई.पू.)

भारत में सर्वप्रथम पाषाण कालीन सभ्यता तथा संस्कृति का अन्वेषण रॉबर्ट ब्रूस फुट महोदय ने 1863 ई. में किया था। पुरापाषाण काल को पुनः तीन भागों में बांटा जाता है:

श्रेणी क्षेत्र — जहाँ से औजार पाए गए
निम्न पुरापाषाण युग सोहन घाटी (पाकिस्तान पंजाब), बेलन घाटी (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश)
मध्य पुरापाषाण युग सोहन घाटी, बेलन घाटी, नर्मदा घाटी और तुंगभद्रा घाटी
उत्तर पुरापाषाण युग बेलन घाटी, छोटानागपुर पठार, मध्य भारत, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश
  • औजार एवं लक्षण — इस काल के लोग शिकारी व खाद्य संग्राहक थे। मुख्य औजार कुल्हाड़ी या हस्तकुठार (हैंड एक्स), विदारिणी (क्लीवर) और खंडक (गंडासा) थे। भारत में सबसे पुराना हस्तकुठार सोहन घाटी से मिला है।
  • लोहंदा नाला (बेलन घाटी) — यहाँ से पशु की हड्डी से बनी प्राचीनतम मूर्ति प्राप्त हुई है। हथनोरा (मध्य प्रदेश) से हाथी का सबसे पुराना जीवाश्म मिला है।
  • भीमबेटका (मध्य प्रदेश) — यहाँ से मानवों की गुफाएं मिली हैं जिनमें विभिन्न कालों की चित्रकारी देखने को मिलती है। इसकी खोज 1958 में बी.एस. वाकणकर ने की थी। पुरापाषाण काल के अंत में आग का आविष्कार हुआ।

2. मध्यपाषाण काल (10,000 ई.पू. से 4,000 ई.पू.)

  • विशेषताएं — यह काल पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का संधिकाल है। इस काल में मानव लघु पाषाण उपकरण (Microliths) का प्रयोग करता था। भारत में सबसे पहले लघु पाषाण उपकरण 1867 ई. में सी.एल. कार्लाइल द्वारा विंध्य क्षेत्र में खोजे गए।
  • प्रमुख उपकरण — इस काल के प्रमुख उपकरण इकधार, फलक, वेधनी, अर्द्धचन्द्राकार और समलंब थे। इस काल में प्रक्षेपास्त्र तकनीक (तीर-कमान) का विकास हुआ।
  • प्रमुख स्थल — आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) और बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से 6वीं सहस्राब्दी ई.पू. के पशुपालन के सबसे प्राचीन साक्ष्य मिले हैं।

3. नवपाषाण काल (4,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू.)

  • क्रांतिकारी परिवर्तन — इस काल में कृषि का आरंभ हुआ, मानव ने स्थाई निवास की अवधारणा अपनाई और 'कुत्ते' को सर्वप्रथम पालतू पशु बनाया। मानव ने पॉलिशदार पत्थर के औजारों का प्रयोग शुरू किया।
  • गर्त-आवास (बुर्जहोम) — कश्मीर के बुर्जहोम से गर्त-आवास (गड्ढा घर) और मानव शव के साथ पालतू कुत्ते को दफनाने के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से मिट्टी के बर्तन, बुनने के साक्ष्य और पहिए का आविष्कार भी इसी काल में हुआ।

आद्य ऐतिहासिक काल एवं ताम्रपाषाण संस्कृति

आद्य ऐतिहासिक काल को दो भागों में बांटा जाता है— ताम्रपाषाण काल (3500 ई.पू. - 1200 ई.पू.) और लौह काल (1000 ई.पू. - 600 ई.पू.)। ताम्रपाषाण काल के लोग तांबे और पत्थर का साथ-साथ प्रयोग करते थे, यह मुख्यतः ग्रामीण कृषक संस्कृति थी।

  • अहार संस्कृति (राजस्थान) — दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की इस ताम्रपाषाणिक संस्कृति को 'अहार संस्कृति' या 'आहाड़ संस्कृति' कहा जाता है। अहार का प्राचीन नाम 'ताम्बवती' (ताँबा वाली जगह) था।
  • नवदाटोली, एरण और नागदा — ये मालवा संस्कृति के मुख्य स्थल हैं। नवदाटोली का उत्खनन कार्य प्रोफेसर एच.डी. सांकलिया ने करवाया था।
  • ताँबा धातु का सर्वप्रथम प्रयोग — मानव द्वारा सर्वप्रथम ताँबा धातु का प्रयोग किया गया था और पहला औजार 'कुल्हाड़ी' बनाया गया था, जिसके साक्ष्य अतिरम्पक्कम से मिले हैं।
  • लौह काल — उत्तर भारत में लौह काल के साथ-साथ चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) संस्कृति कायम हुई। दक्षिण भारत में लौह काल महापाषाण संस्कृति के समकालीन था।
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