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प्रान्तीय राजवंश, सूफी व भक्ति आन्दोलन

1 min read 44 views 06 Jul 2026 Indian GK
कक्षा VI-XII NCERT सार संकलन पर आधारित जौनपुर, मालवा, कश्मीर व मेवाड़ के राजवंश, सूफी सिलसिले (चिश्ती, सुहरावर्दी) तथा भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्तों के विस्तृत नोट्स।
Key Points
  • सांस्कृतिक और शैक्षणिक उन्नति के कारण जौनपुर शहर को मध्यकाल में 'भारत का शीराज' कहा जाता था.
  • कश्मीर के शासक जैन-उल-आबिदीन को धार्मिक सहिष्णुता के कारण 'कश्मीर का अकबर' कहा जाता है.
  • मेवाड़ के राणा कुम्भा ने प्रसिद्ध संगीत ग्रंथों 'संगीतराज' और 'संगीत मीमांसा' की रचना की थी.
  • भारत में चिश्ती सिलसिले की शुरुआत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने की तथा इनका मुख्य साधना केन्द्र अजमेर था.
  • हजरत निजामुद्दीन औलिया प्रसिद्ध चिश्ती सन्त थे जिन्होंने दिल्ली के 7 सुल्तानों का कार्यकाल देखा था.
  • उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन को फैलाने का श्रेय स्वामी रामानन्द को है, जिन्होंने हिन्दी में उपदेश दिए.
  • सिख धर्म के द्वितीय गुरु, गुरु अंगद देव को प्रसिद्ध 'गुरुमुखी लिपि' का जनक माना जाता है.

भाग 1: स्वतन्त्र प्रान्तीय राजवंश — इतिहास व स्थापत्य

दिल्ली सल्तनत के विघटन के काल में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक स्वतन्त्र प्रान्तीय राजवंशों का उदय हुआ।

1. जौनपुर, कश्मीर एवं मालवा

  • जौनपुर — इसकी स्थापना फिरोजशाह तुगलक ने अपने चचेरे भाई जौना खां (मुहम्मद बिन तुगलक) की याद में की थी। सांस्कृतिक उन्नति के कारण इसे 'भारत का शीराज' कहा जाता था। मलिक सरवर ने यहाँ स्वतन्त्र शर्की वंश की नींव डाली। इब्राहिम शाह शर्की ने 1408 ई. में प्रसिद्ध अटाला मस्जिद तथा झंझरी मस्जिद का निर्माण करवाया।
  • कश्मीर — यहाँ 1301 ई. में सुहादेव ने हिन्दू राजवंश की स्थापना की। सुहादेव के मन्त्री शाहमीर ने प्रथम मुस्लिम राजवंश की स्थापना की। इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक जैन-उल-आबिदीन (1420-70 ई.) था, जिसे 'बुडशाह' या 'महान सुल्तान' कहा जाता है। इसने जजिया कर हटाया तथा गोहत्या व सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाया, जिसके कारण इसे 'कश्मीर का अकबर' कहा जाता है। यह 'कुतुब' उपनाम से कविताएँ लिखता था।
  • मालवा — यहाँ स्वतन्त्र सल्तनत की स्थापना 1401 ई. में हुसैन खाँ गोरी (दिलावर खाँ) ने की थी। इसके पुत्र अलप खाँ ने हुशंगशाह की उपाधि धारण कर राजधानी को धारा से 'मांडू' स्थानान्तरित किया। गयासुद्दीन खिलजी ने मांडू में प्रसिद्ध जहाज महल का तथा हुशंगशाह ने मांडू के किले का निर्माण करवाया। नासिरुद्दीन शाह द्वारा बाज बहादुर एवं रूपमती के महल का निर्माण करवाया गया था।

2. मेवाड़, मारवाड़ एवं गुजरात

  • मेवाड़ — यहाँ सर्वप्रथम गुहिल, फिर गहलोत और बाद में सिसोदिया राजवंश ने शासन किया। सिसोदिया वंश के संस्थापक हम्मीर देव थे।
    • राणा कुम्भा — इन्होंने जयदेव की गीत गोविन्द पर 'रसिक प्रिया' नामक टीका लिखी तथा संगीत शास्त्र पर 'संगीतराज', 'संगीत मीमांसा' व 'संगीत रत्नाकर' ग्रंथों की रचना की। इन्होंने चित्तौड़ में विजयस्तम्भ का निर्माण करवाया था।
    • राणा सांगा व अन्य — राणा सांगा ने खातोली के युद्ध (1517-18 ई.) में इब्राहिम लोदी को तथा खानवा के युद्ध (1527 ई.) में बाबर से युद्ध किया। हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ई.) अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुआ।
  • मारवाड़ व आमेर — मारवाड़ में राठौड़ वंश के शासक चुन्द ने स्थापना की। चुन्द के बेटे जोधा ने जोधपुर नगर की स्थापना की। मालदेव मारवाड़ का सबसे महान शासक था। आमेर (जयपुर) में कछवाहा वंश का शासन था, जिसकी स्थापना दुल्ह राय ने 10वीं सदी में की थी। यहाँ के शासक भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार की थी।
  • गुजरात — जफर खाँ ने 1407 ई. में स्वतन्त्र मुजफ्फरशाही राजवंश की स्थापना की। अहमदशाह-I (1411-42 ई.) ने गुजरात में पहली बार जजिया कर लगाया तथा अहमदाबाद नगर की स्थापना की। इस वंश का सबसे महान शासक महमूद शाह-I (महमूद बेगड़ा) था।

भाग 2: सूफी आन्दोलन — प्रमुख सिलसिले व विचारधारा

सूफीवाद इस्लाम के भीतर ही एक सुधारवादी आन्दोलन के रूप में ईरान से शुरू हुआ था, जहाँ 'सूफी' शब्द का अर्थ पवित्रता से है। सूफी जिन आश्रमों में निवास करते थे, उन्हें 'खानकाह' या मठ कहा जाता था। सूफियों को दो भागों— बा-शरा (इस्लामी सिद्धान्त के समर्थक) तथा बे-शरा (इस्लामी सिद्धान्त से बंधे नहीं) में विभाजित किया गया था।

1. चिश्ती सिलसिला एवं प्रमुख सन्त

भारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती थे, जो 1192 ई. में मोहम्मद गोरी के साथ भारत आए और इनका मुख्य केन्द्र अजमेर था।

  • बाबा फरीद (फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर) — ये बख्तियार काकी के शिष्य थे। इनकी रचनाएँ सिखों के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी शामिल हैं।
  • हजरत निजामुद्दीन औलिया — ये बाबा फरीद के शिष्य थे। इन्होंने अपने जीवनकाल में दिल्ली के 7 सुल्तान का शासन देखा था। इनके प्रमुख शिष्य शेख सलीम चिश्ती, अमीर खुसरो और अमीर हसन देहलवी थे।
  • शेख बुरहानुद्दीन गरीब — इन्होंने 1340 ई. में दक्षिण भारत के क्षेत्रों में चिश्ती सम्प्रदाय की शुरुआत की और दौलताबाद को मुख्य केन्द्र बनाया।

2. अन्य प्रमुख सूफी सिलसिले

सूफी सिलसिला मुख्य संस्थापक प्रमुख प्रभाव क्षेत्र / केन्द्र
सुहरावर्दी शेख शहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी / बहाउद्दीन जकारिया उच्च (सिंध) एवं मुल्तान, पंजाब
कादिरी शेख अब्दुल कादिर अल जिलानी / मोहम्मद गौस मुल्तान, पंजाब व बगदाद
नक्शबंदी ख्वाजा बाकी बिल्लाह / शेख अहमद सरहिन्दी भारत (अकबर के समय व्यापक प्रचार)
शत्तारी / फिरदौसी शाह अब्दुल्ला शत्तारी / शेख बदरुद्दीन मध्य व पूर्वी भारत, बिहार

भाग 3: भक्ति आन्दोलन — सन्त, सम्प्रदाय एवं सिख धर्म

भक्ति आन्दोलन की शुरुआत छठी शताब्दी में तमिल क्षेत्र से हुई, जो शीघ्र ही कर्नाटक और महाराष्ट्र में फैल गया। इसका विकास 12 अलवार (वैष्णव) और 63 नयनार (शैव) सन्तों ने किया। भक्ति आन्दोलन दो धाराओं— निर्गुण धारा (निराकार प्रभु, जैसे कबीर, नानक) एवं सगुण धारा (मूर्तिपूजा, जैसे तुलसीदास, मीरा, सूरदास) में विभाजित था।

1. दक्षिण भारत के प्रमुख आचार्य व सन्त

  • रामानुजाचार्य (1060-1118 ई.) — इन्होंने 'विशिष्टाद्वैत' मत का प्रतिपादन किया और श्री सम्प्रदाय की स्थापना की। इन्हें श्री वैष्णव पंथ का संस्थापक माना जाता है।
  • शंकराचार्य (788 ई.) — इनका जन्म केरल में अलवाई नदी के तट पर हुआ था। इन्होंने 'अद्वैतवाद' और नवब्राह्मण धर्म की स्थापना की तथा भारत में चार मठों की स्थापना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ ब्रह्मसूत्र भाष्य और गीता भाष्य हैं।
  • ज्ञानेश्वर (1271-96 ई.) — इन्होंने महाराष्ट्र में भागवत धर्म की आधारशिला रखी तथा भगवद् गीता पर 'भावार्थ दीपिका' नामक टीका लिखी।
  • तुकाराम व रामदास — तुकाराम (1598-1650 ई.) के उपदेश 'अभंगों' में संकलित हैं। समर्थ रामदास (1608-81 ई.) छत्रपति शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु थे, जिनका मुख्य ग्रंथ 'दासबोध' है।

2. उत्तर भारत के प्रमुख सन्त

  • रामानन्द (1360-1470 ई.) — इनका जन्म प्रयाग में हुआ था। इन्होंने भक्ति को मोक्ष का एकमात्र साधन स्वीकार कर सभी जातियों के लिए इसके द्वार खोल दिए। इन्होंने हिन्दी भाषा में उपदेश दिए। इनके 12 शिष्यों में कबीर, रैदास, धन्ना और पीपा प्रमुख थे।
  • कबीरदास (1440-1510 ई.) — इनका जन्म वाराणसी (लहरतारा) में हुआ था। ये सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। इन्होंने एकेश्वरवाद में आस्था व्यक्त की एवं 'निराकार ब्रह्म' की उपासना पर बल दिया।
  • रैदास (रविदास) — ये जाति से चमार थे और रामानन्द के शिष्य थे। इन्होंने 'रायदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की। मीराबाई ने रैदास को अपना गुरु माना था।
  • सूरदास व मीराबाई — सूरदास (1479-1589 ई.) की प्रमुख रचनाएँ 'सूरसागर', 'साहित्यरत्न' व 'सूरसारावली' हैं। मीराबाई ने श्रीकृष्ण की भक्ति सगुण रूप में की थी।
  • चैतन्य महाप्रभु — इनका जन्म नदिया (बंगाल) में हुआ था। इन्होंने संकीर्तन प्रथा को जन्म दिया तथा 'अचिंत्य भेदाभेदवाद' दर्शन का प्रतिपादन किया।

3. सिख सम्प्रदाय एवं 10 गुरु

सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव (1469-1539 ई.) ने की थी, जिनका जन्म पंजाब के तलवंडी (नन्काना साहिब) में हुआ था। ये बाबर और हुमायूं के समकालीन थे तथा सूफी सन्त बाबा फरीद से प्रभावित थे।

सिख धर्म के सभी 10 गुरुओं का क्रम इस प्रकार है:

क्र.सं. सिख गुरु का नाम मुख्य कार्य / ऐतिहासिक विशेषताएँ
1 गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक।
2 गुरु अंगद 'गुरुमुखी लिपि' के जनक।
3 गुरु अमरदास गुरु प्रसार हेतु 22 गद्दियों का निर्माण करवाया।
4 गुरु रामदास अमृतसर नगर के संस्थापक।
5 गुरु अर्जुनदेव 'गुरु ग्रंथ साहिब' का संकलन किया, अमृतसर में स्वर्ण मंदिर का निर्माण करवाया; जहाँगीर ने इन्हें फाँसी दी।
6 गुरु हरगोविन्द अकाल तख्त की स्थापना की तथा सिखों को सैन्य रूप दिया।
7 गुरु हरराय मुगलों के उत्तराधिकार युद्ध (दारा शिकोह की सहायता) में भाग लिया।
8 गुरु हरकिशन अल्पवयस्क अवस्था में ही चेचक के कारण मृत्यु।
9 गुरु तेगबहादुर इस्लाम स्वीकार न करने के कारण औरंगज़ेब ने इन्हें दिल्ली में फाँसी दी।
10 गुरु गोविन्द सिंह 'खालसा सेना' का गठन किया तथा सिखों के अंतिम गुरु बने।
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