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प्रमुख संविधान संशोधन - प्रक्रिया व महत्वपूर्ण अधिनियम

1 min read 29 views 06 Jul 2026 Indian GK
भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368), आधारभूत ढाँचे का सिद्धान्त और 1वें से लेकर 106वें (नवीनतम संशोधन 2026) तक के सभी महत्वपूर्ण संशोधनों का सम्पूर्ण कवरेज।
Key Points
  • संविधान संशोधन का प्रावधान दक्षिण अफ्रीका के संविधान से प्रेरित है और यह शक्ति केवल भारतीय संसद को प्राप्त है.
  • 24वें संविधान संशोधन (1971) द्वारा राष्ट्रपति को संविधान संशोधन विधेयक पर अनिवार्य रूप से हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया है.
  • संसद द्वारा किए गए किसी भी संविधान संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'आधारभूत ढांचे' के उल्लंघन के आधार पर अवैध घोषित किया जा सकता है.
  • 42वें संविधान संशोधन को 'लघु संविधान' भी कहा जाता है, जिसके द्वारा प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े गए और मूल कर्तव्यों को शामिल किया गया.
  • 104वें संशोधन अधिनियम द्वारा एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए सीटों के आरक्षण को आगे नहीं बढ़ाया गया है.
  • 106वां संविधान संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) देश की विधायिकाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद-368)

भारतीय संविधान के भाग 20 में अनुच्छेद-368 के तहत संसद को संविधान संशोधन की शक्ति और प्रक्रिया प्रदान की गई है। संसद प्रस्तावना तथा मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार संसद इसके 'आधारभूत ढाँचे' (Basic Structure) में बदलाव नहीं कर सकती।

संशोधन की मुख्य प्रक्रिया एवं नियम

  • विधेयक की प्रस्तुति — संशोधन के लिए सर्वप्रथम संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति आवश्यक नहीं है।
  • पारित होना — विधेयक को दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित किया जाना अनिवार्य है। मतभेद की स्थिति में दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन (अनुच्छेद 108) नहीं बुलाया जा सकता। यदि एक सदन भी अस्वीकार कर दे, तो विधेयक समाप्त हो जाता है।
  • राष्ट्रपति की अनुमति — 24वें संविधान संशोधन 1971 द्वारा राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्य है, वे इसे न तो रोक सकते हैं और न पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधेयक 'संविधान संशोधन अधिनियम' बन जाता है।

संशोधन के तीन प्रकार

संशोधन का प्रकारविवरण व प्रक्रियाप्रमुख उदाहरण / उपबन्ध
1. साधारण बहुमत द्वारासदन में उपस्थित और मतदान करने वाले आधे से अधिक (Simple Majority) सदस्यों द्वारा। इसे अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन नहीं माना जाता।• नए राज्यों का प्रवेश (अनु. 2) या निर्माण व सीमा परिवर्तन (अनु. 3)
• नागरिकता (अनु. 11)
• राज्यों में विधान परिषद् का सृजन/उत्पादन (अनु. 169)
• पहली, 5वीं, 6ठी व 8वीं अनुसूची।
2. विशेष बहुमत द्वारासदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत।• मूल अधिकार
• राज्य के नीति-निदेशक तत्व
• अन्य सभी उपबंध जो प्रथम व तृतीय श्रेणी में नहीं आते।
3. विशेष बहुमत व राज्यों के अनुसमर्थन द्वारासंसद के प्रत्येक सदन के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम-से-कम आधे (1/2) राज्यों के विधानमण्डलों का साधारण बहुमत से अनुसमर्थन आवश्यक है। यह संघात्मक ढाँचे से जुड़े विषयों के लिए होता है।• राष्ट्रपति का निर्वाचन व रीति (अनु. 54, 55)
• संघ व राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार (अनु. 73, 162)
• उच्चतम व उच्च न्यायालय (अनु. 241, भाग 5 व 6)
• 7वीं अनुसूची की कोई भी सूची (संघ, राज्य, समवर्ती)।

सर्वोच्च न्यायालय और 'आधारभूत ढाँचे का सिद्धान्त'

सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य (1973) के ऐतिहासिक मामले में आधारभूत ढाँचे (Basic Structure) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इसके तहत न्यायालय ने माना कि संविधान का एक मूल स्वरूप है जिसे संसद भी नष्ट नहीं कर सकती। विभिन्न वादों में घोषित कुछ प्रमुख आधारभूत ढांचे निम्नलिखित हैं:

  • संविधान की सर्वोच्चता, लोकतन्त्रात्मक व गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली।
  • शक्तियों का पृथक्करण तथा संविधान का पंथ निरपेक्ष व संघात्मक स्वरूप।
  • राष्ट्र की एकता, अखण्डता और कानून का शासन (विधि का शासन)।
  • न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव।
  • संसद की संविधान संशोधन की सीमित शक्ति।

महत्वपूर्ण संविधान संशोधन अधिनियम (नवीनतम अपडेट सहित)

  • पहला संशोधन (1950-51) — इसके द्वारा संविधान में 9वीं अनुसूची को जोड़ा गया ताकि भूमि सुधार कानूनों को न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा जा सके।
  • 7वां संशोधन (1956) — राज्यों का 4 श्रेणियों (A, B, C, D) में विभाजन समाप्त कर 14 राज्य और 6 केन्द्र शासित प्रदेश गठित किए गए। लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 520 निश्चित की गई।
  • 24वां संशोधन (1971) — संसद को मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन की शक्ति दी गई तथा राष्ट्रपति को संशोधन विधेयक पर मंजूरी देने के लिए बाध्य किया गया।
  • 42वां संशोधन (1976) (लघु संविधान) — प्रस्तावना में तीन नए शब्द 'पंथनिरपेक्ष', 'समाजवादी' और 'अखण्डता' जोड़े गए। भाग 4(क) और अनुच्छेद 51(क) जोड़कर नागरिकों के लिए 10 मूल कर्त्तव्य निर्धारित किए गए। शिक्षा, वन, वन्य जीवों का संरक्षण आदि विषयों को समवर्ती सूची में डाला गया।
  • 44वां संशोधन (1978)सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300(क) के तहत कानूनी अधिकार बनाया गया। राष्ट्रीय आपातकाल (अनु. 352) के संदर्भ में 'आन्तरिक अशान्ति' शब्द के स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द जोड़ा गया।
  • 52वां संशोधन (1985) — दलबदल विरोधी प्रावधानों को शामिल कर संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई।
  • 61वां संशोधन (1989) — मताधिकार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
  • 73वां व 74वां संशोधन (1992-93) — क्रमशः पंचायती राज संस्थाओं (11वीं अनुसूची) तथा शहरी स्थानीय स्वशासन संस्थाओं (12वीं अनुसूची) को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
  • 86वां संशोधन (2002) — प्रारंभिक शिक्षा को मूल अधिकार (अनुच्छेद 21क) बनाया गया और 11वां मूल कर्तव्य जोड़ा गया।
  • 92वां संशोधन (2003) — 8वीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाएँ जोड़ी गईं, जिससे कुल भाषाएँ 22 हो गईं।
  • 101वां संशोधन (2015-16) — देश में एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (GST) की व्यवस्था लागू की गई।
  • 103वां संशोधन (2019) — आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग (EWS) के लिए शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में 10% आरक्षण का प्रावधान।
  • 104वां संशोधन (2019-20) — लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों (SC) और जनजातियों (ST) के लिए आरक्षण की समय-सीमा को 10 वर्ष (25 जनवरी 2030 तक) के लिए बढ़ाया गया तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय के मनोयन के प्रावधान को समाप्त किया गया।
  • 105वां संशोधन (2021) — राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की सूची स्वयं बनाने की शक्ति बहाल की गई।
  • 106वां संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) *CURRENT UPDATE* — इस ऐतिहासिक अधिनियम के तहत लोकसभा, दिल्ली विधानसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत (1/3) सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। यह आरक्षण कानून लागू होने के बाद होने वाले पहले परिसीमन से प्रभावी होगा और 15 वर्षों की अवधि तक लागू रहेगा।
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