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Title: पादप आकारिकी (Plant Morphology) एवं पादप हार्मोन (Plant Hormones) सम्पूर्ण सार नोट्स

2 min read 52 views 06 Jul 2026 General Science
पादप आकारिकी की संरचना, कार्यों और पादप हार्मोन्स के प्रकार, कार्यों तथा प्रभावों का विस्तृत विवरण। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण विषय।
Key Points
  • पादप आकारिकी में जड़, तना, पत्ती की संरचना और कार्यों का अध्ययन होता है
  • ऑक्सिन, जिब्बेरेलिन, साइटोकाइनिन, एबसिसिक एसिड और इथाइलीन मुख्य पादप हार्मोन हैं
  • हार्मोन्स पौधों की वृद्धि, विकास और शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं
  • व्यावसायिक कृषि में हार्मोन्स का व्यापक उपयोग फसल सुधार के लिए किया जाता है
  • हार्मोन असंतुलन से पौधों में विभिन्न विकार हो सकते हैं
  • अदरक और हल्दी भूमिगत तने के 'प्रकंद' (Rhizome) रूपांतरण के उदाहरण हैं, जबकि आलू एक 'स्तम्भ कंद' (Tuber) है जिसकी आँखें उसकी पर्वसंधियाँ होती हैं।
  • पादप हार्मोन 'ऑक्सिन' शीर्ष प्रभाविता (Apical Dominance) के लिए उत्तरदायी है, और इसकी खोज एफ. डब्ल्यू. वेंट ने की थी।
  • आनुवंशिक रूप से बौने पौधों को लंबा करने तथा बीजों की प्रसुप्ति भंग कर अंकुरण प्रेरित करने का मुख्य कार्य 'जिब्बेरेलिन' ($GA_3$) हार्मोन का है।
  • कृत्रिम ऑक्सिन '2,4-D' का उपयोग कृषि और बागवानी में मुख्य रूप से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नष्ट करने (खरपतवार नाशक) के रूप में किया जाता है।

पादप आकारिकी (Plant Morphology)

पादप आकारिकी (Plant Morphology) आकारकीय विज्ञान या वनस्पति विज्ञान की वह महत्वपूर्ण शाखा है जिसके अंतर्गत पौधों के बाह्य अंगों की संरचना, रूप, विन्यास और उनके रूपांतरणों (Modifications) का क्रमबद्ध व वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। पादप कार्यिकी (Physiology) और वर्गीकरण (Taxonomy) को समझने के लिए आकारिकी का ज्ञान अनिवार्य है। एक आदर्श आवृतबीजी (Angiosperm) पौधे को मुख्यतः दो प्रणालियों में बांटा जाता है: जड़ तंत्र (Root System) और प्ररोह तंत्र (Shoot System)

पादप के मुख्य भाग एवं उनकी संरचना

1. जड़ (Root)

जड़ पौधे का भूमिगत, प्रकाश-विरोधी (Negatively Phototropic) और धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (Positively Geotropic) भाग है, जो बीज के अंकुरण के समय मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है। इसका मुख्य कार्य पौधे को भूमि में स्थिर रखना तथा जल व खनिजों का अवशोषण करना है। उत्पत्ति के आधार पर जड़ें तीन प्रकार की होती हैं:

  • मूसला जड़ (Tap Root): यह द्विबीजपत्री (Dicotyledonous) पौधों में पाई जाती है। इसमें मूलांकुर लगातार वृद्धि करके एक मुख्य प्राथमिक जड़ बनाता है, जिससे पार्श्वीय द्वितीयक और तृतीयक जड़ें निकलती हैं (जैसे- सरसों, चना, गाजर, मूली)।
  • अपस्थानिक जड़ (Adventitious Root): जब जड़ का विकास मूलांकुर के अतिरिक्त पौधे के किसी अन्य भाग (जैसे तने के आधार, शाखाओं या पत्तियों) से होता है, तो उसे अपस्थानिक जड़ कहते हैं (जैसे- बरगद की स्तम्भ जड़ें, मक्का की अवस्तम्भ जड़ें)।
  • रेशेदार जड़ (Fibrous Root): यह मुख्य रूप से एकबीजपत्री (Monocotyledonous) पौधों में पाई जाती है। इसमें प्राथमिक जड़ अल्पायु होती है और उसके स्थान पर तने के आधार से धागे जैसी पतली जड़ों का गुच्छा निकल आता है (जैसे- गेहूँ, धान, घास)।

2. तना (Stem)

तना प्ररोह तंत्र का मुख्य भाग है, जो बीज के अंकुरण के समय प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है। यह धनात्मक प्रकाशानुवर्ती (Positively Phototropic) होता है। तने की मुख्य विशेषता इस पर पर्व (Internodes) और पर्वसंधियों (Nodes) की उपस्थिति है, जहाँ से पत्तियाँ और शाखाएँ निकलती हैं। स्थिति और रूपांतरण के आधार पर तने को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है:

  • वायवीय तना (Aerial Stem): जो पूर्णतः भूमि के ऊपर सीधे या सीधे न होकर रूपांतरित होते हैं। जैसे- टेंड्रिल (मटर में बेल चढ़ने हेतु) या कांटे (Thorns): जो नींबू, बोगनवेलिया में सुरक्षा और वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए रूपांतरित तने होते हैं।
  • अर्ध-वायवीय तना (Sub-aerial Stem): यह आंशिक रूप से भूमि के अंदर और बाहर होता है, जो कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) में सहायक है (जैसे- उपरिभूस्तारी या Runner - दूब घास, भूस्तारी - पुदीना)।
  • भूमिगत तना (Underground Stem): प्रतिकूल परिस्थितियों में भोजन संचय और चिरकालिकता के लिए तने का भाग भूमिगत हो जाता है। इन्हें हरी पत्तियों की अनुपस्थिति और पर्वसंधियों से पहचाना जाता है:
    प्रकंद (Rhizome): क्षैतिज वृद्धि करने वाला तना (जैसे- अदरक, हल्दी)।
    स्तम्भ कंद (Tuber): भोजन संचय से फूला हुआ सिरा (जैसे- आलू; आलू की 'आँखें' इसकी पर्वसंधियाँ हैं)।
    शल्क कंद (Bulb): अत्यंत छोटा तना जिसके चारों ओर गूदेदार शल्क पत्र होते हैं (जैसे- प्याज, लहसुन)।
    घनकंद (Corm): ऊर्ध्वाधर (Vertical) वृद्धि करने वाला सघन भूमिगत तना (जैसे- अरबी, जमीकंद)।

3. पत्ती (Leaf)

पत्ती तने की पर्वसंधि (Node) से निकलने वाली पार्श्वीय, चपटी और हरी संरचना है, जो पौधों का मुख्य प्रकाश-संश्लेषणी अंग (Photosynthetic Organ) है। इसमें हरितलवक (Chloroplast) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

  • सरल पत्ती (Simple Leaf): जब पत्ती का पर्णफलक (Lamina) पूर्णतः अखंडित होता है या कटाव होने पर भी कटाव मध्यशिरा तक नहीं पहुँचता (जैसे- आम, पीपल)।
  • संयुक्त पत्ती (Compound Leaf): जब पर्णफलक का कटाव मध्यशिरा तक पहुँचकर उसे कई छोटे-छोटे फलकों में तोड़ देता है, जिन्हें 'पर्णक' (Leaflets) कहते हैं (जैसे- नीम, गुलाब)।
  • पर्णविन्यास (Phyllotaxy): तने पर पत्तियों के लगने के क्रम को पर्णविन्यास कहते हैं। यह तीन प्रकार का होता है: एकांतरित (Alternate) — प्रत्येक पर्वसंधि पर एक पत्ती (जैसे- गुड़हल); सम्मुख (Opposite) — एक पर्वसंधि पर दो पत्तियाँ आमने-सामने (जैसे- आक, अमरूद); चक्रिक (Whorled) — एक ही पर्वसंधि पर दो से अधिक पत्तियाँ चक्र के रूप में (जैसे- कनेर)।

पादप हार्मोन (Plant Hormones / Phytohormones)

पादप हार्मोन या फाइटो हार्मोन वे जटिल कार्बनिक रासायनिक पदार्थ हैं जो पौधों के भीतर प्राकृतिक रूप से अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में संश्लेषित होते हैं और वहीं से परिवहन द्वारा अन्य भागों में पहुँचकर पौधों की वृद्धि, विकास, उपापचयी क्रियाओं और पर्यावरणीय उद्दीपनों के प्रति अनुक्रियाओं को नियंत्रित व समन्वित करते हैं। इन्हें मुख्यतः वृद्धि प्रवर्धक (Growth Promoters) और वृद्धि अवरोधक (Growth Inhibitors) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

मुख्य पादप हार्मोन्स एवं उनके जैविक कार्य

1. ऑक्सिन (Auxin) - वृद्धि प्रवर्धक

खोज एवं इतिहास: चार्ल्स डार्विन ने सर्वप्रथम इसके प्रभाव (प्रकाशानुवर्तन) को देखा, परंतु ऑक्सिन को अलग करने और इसकी विस्तृत खोज का श्रेय एफ. डब्ल्यू. वेंट (F.W. Went, 1928) को जई के प्रांकुर चोल (Avena coleoptile) प्रयोगों के माध्यम से जाता है।
मुख्य प्राकृतिक प्रकार: इंडोल-3-एसिटिक एसिड (IAA) और इंडोल ब्यूटायरिक एसिड (IBA)।
प्रमुख जैविक कार्य:

  • कोशिका दीर्घीकरण (Cell Elongation): यह कोशिका भित्ति के ढीलेपन को बढ़ाकर कोशिका के आकार में वृद्धि करता है।
  • अग्रस्थ प्रभाविता (Apical Dominance): शीर्ष कलिका (Apical Bud) की उपस्थिति में पार्श्व कलिकाओं (Lateral Buds) की वृद्धि रुक जाती है। शीर्ष कलिका को काटने पर पौधा झाड़ीदार हो जाता है।
  • जड़ों का प्रेरण: कम सांद्रता पर यह तने की कतरनों (Cuttings) में जड़ों के फूटने को प्रेरित करता है।
  • विलगन को रोकना: यह तरुण पत्तियों और फलों को समय से पूर्व गिरने (Absicission) से रोकता है।

2. जिब्बेरेलिन (Gibberellin) - वृद्धि प्रवर्धक

खोज एवं इतिहास: जापानी वैज्ञानिक ई. कुरोसावा (1926) ने धान में होने वाले 'बेकेन' (मूर्ख संकर - Bakanae) रोग के अध्ययन के दौरान की, जो जिब्बेरेला फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) नामक कवक द्वारा होता था।
मुख्य प्रकार: अब तक 100 से अधिक जिब्बेरेलिन्स खोजे जा चुके हैं, जिनमें $GA_3$ (जिब्बेरेलिक एसिड) सबसे सामान्य और सक्रिय है।
प्रमुख जैविक कार्य:

  • पर्व का दीर्घीकरण (Internodal Elongation): यह आनुवंशिक रूप से बौने पौधों (जैसे बौना मटर या मक्का) के तने को अचानक लंबा करने की क्षमता रखता है। इसे 'बोल्टिंग प्रभाव' (Bolting Effect) भी कहते हैं (जैसे गोभी में पुष्पक्रम से पूर्व तने का बढ़ना)।
  • बीज अंकुरण: यह बीजों की प्रसुप्ति (Dormancy) को भंग कर $\alpha$-एमाइलेज ($\alpha$-amylase) जैसे पाचक एंजाइमों को सक्रिय करता है, जिससे संचित स्टार्च का अपघटन होता है और अंकुरण शुरू होता है।
  • अनिर्षेकफलन (Parthenocarpy): बिना निषेचन के बीज रहित फल बनाने में यह ऑक्सिन से भी अधिक प्रभावी है (जैसे अंगूर व सेब में)।

3. साइटोकाइनिन (Cytokinin) - वृद्धि प्रवर्धक

खोज एवं इतिहास: स्कूग और मिलर (Skoog and Miller, 1955) ने हेरिंग मछली के स्पर्म के विकृत DNA से 'काइनिटिन' के रूप में इसे खोजा। पौधों में प्राकृतिक साइटोकाइनिन 'जिएटिन' (Zeatin) की खोज लेथम ने मक्का के दानों से की। यह नारियल के पानी में प्रचुरता से पाया जाता है।
प्रमुख जैविक कार्य:

  • कोशिका विभाजन (Cell Division): यह ऑक्सिन की उपस्थिति में अत्यधिक तीव्र गति से समसूत्री कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है।
  • पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि: यह ऑक्सिन द्वारा उत्पन्न अग्रस्थ प्रभाविता को नष्ट कर पार्श्व कलिकाओं के विकास को बढ़ावा देता है, जिससे पौधा चौड़ाई में बढ़ता है।
  • जीर्णता में देरी (Delay of Senescence): यह पत्तियों में पोषक तत्वों के संचरण को बनाए रखता है, जिससे क्लोरोफिल नष्ट नहीं होता और पत्तियाँ लंबे समय तक हरी रहती हैं। इसे 'रिचमंड-लेंग प्रभाव' (Richmond-Lang Effect) कहते हैं।

4. एबसिसिक एसिड (Abscisic Acid - ABA) - वृद्धि अवरोधक

खोजकर्ता: एडिकॉट (Addicott) तथा उनके सहयोगियों ने इसे 'एबसिसिन II' और 'डॉर्मिन' के रूप में खोजा।
विशेषता: इसे 'तनाव हार्मोन' (Stress Hormone) भी कहा जाता है क्योंकि यह प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में पौधे की रक्षा करता है।
प्रमुख जैविक कार्य:

  • रंध्रों का बंद होना (Stomatal Closure): जलाभाव या सूखे की स्थिति में यह वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए पत्तियों के रंध्रों (Stomata) को तुरंत बंद कर देता है।
  • प्रसुप्ति को बढ़ावा (Induction of Dormancy): यह बीजों और कलिकाओं के अंकुरण को रोककर उन्हें प्रतिकूल मौसम में निष्क्रिय बनाए रखता है।
  • विलगन (Abscission): यह पत्तियों, फूलों और पके हुए फलों में विलगन परत (Abscission Layer) के निर्माण को प्रेरित करता है जिससे वे टूटकर गिर जाते हैं।

5. इथाइलीन (Ethylene) - गैसीय हार्मोन (अवरोधक व प्रवर्धक दोनों)

खोजकर्ता: कजिन्स (Cousins) ने प्रमाणित किया कि पके हुए संतरों से निकलने वाली गैस कच्चे केलों को शीघ्र पकाती है। बर्ग (Burg) ने इसे पादप हार्मोन के रूप में स्थापित किया।
प्रकृति: यह पादप जगत में पाया जाने वाला एकमात्र गैसीय हार्मोन है।
प्रमुख जैविक कार्य:

  • फलों का पकना (Fruit Ripening): यह फलों के पकने के समय श्वसन दर को अत्यधिक बढ़ा देता है, जिसे 'क्लाइमेक्टेरिक श्वसन' कहते हैं। यह फलों के रंग, सुगंध और मिठास को नियंत्रित करता है।
  • अनुप्रस्थ वृद्धि (Horizontal Growth): यह तने की लंबाई में वृद्धि को रोकता है तथा तने व जड़ को चौड़ाई में मोटा होने के लिए प्रेरित करता है।
  • मादा पुष्पों की संख्या में वृद्धि: कुकुरबिट्स (खीरा, ककड़ी) में यह नर पुष्पों के स्थान पर मादा पुष्पों के निर्माण को बढ़ाता है, जिससे फसल की पैदावार बढ़ती है।

हार्मोन्स की पारस्परिक क्रिया (Hormonal Interactions)

पौधे के जीवन चक्र की जटिल प्रक्रियाएं किसी एक हार्मोन के नियंत्रण में न होकर, विभिन्न हार्मोन्स के अनुपातिक संतुलन और उनकी पारस्परिक क्रिया (Interactions) पर निर्भर करती हैं:

हार्मोन संयोजन अंतःक्रिया का प्रकार मुख्य जैविक प्रभाव एवं परिणाम
ऑक्सिन + साइटोकाइनिन सहक्रियात्मक (Synergistic) ऊतक संवर्धन (Tissue Culture): यदि ऑक्सिन अधिक हो तो जड़ों का निर्माण (Rhizogenesis) होता है; यदि साइटोकाइनिन अधिक हो तो प्ररोह/तने का निर्माण (Caulogenesis) होता है। दोनों समान होने पर अविभेदित कोशिका समूह 'कैलस' (Callus) बनता है।
जिब्बेरेलिन + साइटोकाइनिन सहक्रियात्मक बीज प्रसुप्ति को तोड़ना, पार्श्व कलिकाओं का विकास और पौधों के अंगों की तीव्र वृद्धि।
ऑक्सिन / जिब्बेरेलिन $\times$ एबसिसिक एसिड विरोधात्मक (Antagonistic) ऑक्सिन व जिब्बेरेलिन वृद्धि और अंकुरण को बढ़ावा देते हैं, जबकि एबसिसिक एसिड (ABA) वृद्धि को रोकता है और बीजों को निष्क्रिय (प्रसुप्त) बनाए रखता है।

फाइटोहार्मोन्स का व्यावसायिक एवं कृषि में उपयोग

आधुनिक कृषि और बागवानी में सिंथेटिक (कृत्रिम) पादप विकास नियामकों (Plant Growth Regulators - PGRs) का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है:

  • NAA (नेफ्थलीन एसिटिक एसिड): यह एक सिंथेटिक ऑक्सिन है। इसका उपयोग कतरनों में जड़ फूटने को तीव्र करने और मिर्च, टमाटर आदि में फूलों को झड़ने से रोकने के लिए किया जाता है।
  • 2,4-D (2,4-डाइक्लोरोफिनॉक्सी एसिटिक एसिड): उच्च सांद्रता पर यह एक अत्यंत प्रभावी चयनात्मक खरपतवार नाशक (Selective Weedicide) के रूप में कार्य करता है। यह मुख्य रूप से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नष्ट करता है, जबकि अनाज की फसलों (जैसे गेहूँ) को सुरक्षित रखता है।
  • GA₃ (जिब्बेरेलिक एसिड): अंगूर की खेती में इसका छिड़काव करने से अंगूर के डंठल लंबे हो जाते हैं और दानों का आकार व गुच्छे बड़े हो जाते हैं। गन्ने की फसल पर छिड़काव करने से पर्वों की लंबाई बढ़ती है, जिससे प्रति एकड़ चीनी का उत्पादन बढ़ जाता है। माल्टिंग उद्योग (शराब निर्माण) में यह ब्रूइंग प्रक्रिया को तेज करता है।
  • इथेफॉन (Ethephon): यह जलीय घोल के रूप में प्रयुक्त होता है, जो धीरे-धीरे टूटकर इथाइलीन गैस मुक्त करता है। इसका उपयोग खेतों में टमाटर, सेब, आम और संतरों को कृत्रिम व एकसमान रूप से जल्दी पकाने के लिए किया जाता है।

हार्मोन असंतुलन के पादप शरीर पर प्रभाव

  • अधिक ऑक्सिन: इसके अति-स्राव या बाह्य छिड़काव से कोशिका भित्ति अत्यधिक शिथिल हो जाती है और जड़ों का अनियंत्रित विकास होने लगता है जो अंततः पौधे की मृत्यु का कारण बन सकता है (इसी सिद्धांत पर 2,4-D खरपतवार नाशक कार्य करता है)।
  • कम जिब्बेरेलिन: पौधे में पर्वों की लंबाई नहीं बढ़ती, जिससे पौधा आनुवंशिक रूप से बौना (Dwarf) रह जाता है और उसमें फूलों का निर्माण देर से होता है।
  • अधिक एबसिसिक एसिड (ABA): पौधे का विकास पूर्णतः अवरुद्ध हो जाता है, पत्तियाँ पीली होकर असमय गिर जाती हैं और रंध्र लंबे समय तक बंद रहने के कारण प्रकाश-संश्लेषण ठप हो जाता है।
  • कम साइटोकाइनिन: कोशिकाओं का विभाजन धीमा हो जाता है, पार्श्व शाखाएं नहीं निकलतीं और पत्तियों में क्लोरोफिल का ह्रास तेजी से होने के कारण वे समय से पूर्व बूढ़ी (Senescent) हो जाती हैं।

अनुसंधान और भविष्य की तकनीकें

वर्तमान आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) और जैव प्रौद्योगिकी के युग में पादप हार्मोन्स के कूटलेखन (Coding) वाले जीनों में हेरफेर करके ऐसी ट्रांसजेनिक फसलें तैयार की जा रही हैं जो सूखे और उच्च लवणता जैसी तनावपूर्ण स्थितियों में भी स्वतः ABA का स्तर नियंत्रित कर जीवित रह सकें। इसके अतिरिक्त पादप हार्मोन्स की नई पीढ़ी जैसे कि ब्रासिनोस्टेरॉयड्स (Brassinosteroids) जो कोशिका विभाजन बढ़ाते हैं, जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic Acid) जो कीटों के विरुद्ध सुरक्षा तंत्र सक्रिय करते हैं, और सैलिसिलिक एसिड (Salicylic Acid) जो पौधों में प्रणालीगत अधिग्रहित प्रतिरोधक क्षमता (SAR) उत्पन्न करते हैं, पर वैश्विक स्तर पर गहन अनुसंधान जारी है।

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