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इसरो (ISRO) के अंतरिक्ष मिशन एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी

1 min read 56 views 06 Jul 2026 General Science
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के महत्वपूर्ण मिशन जिनमें चंद्रयान, गगनयान, आदित्य-L1 और मंगलयान-2 शामिल हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए संपूर्ण अध्ययन सामग्री।
Key Points
  • चंद्रयान-3 मिशन के तहत भारत 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बना, इस दिन को 'राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस' घोषित किया गया है।
  • मंगलयान-1 विश्व का सबसे कम लागत का मार्स मिशन था जो पहली ही कोशिश में सफल हुआ
  • आदित्य-L1 भारत का पहला सूर्य अध्ययन मिशन है जो लैग्रेंज पॉइंट L1 पर स्थित है
  • गगनयान मिशन भारत को चौथा मानव अंतरिक्ष यान भेजने वाला देश बनाएगा
  • इसरो ने 104 उपग्रहों को एक साथ लॉन्च करके विश्व रिकॉर्ड बनाया है
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी और इसका मुख्यालय बेंगलुरु में स्थित है।
  • चंद्रयान-1 ने वर्ष 2008 में चंद्रमा की सतह पर जल के अणुओं की ऐतिहासिक खोज की थी।
  • भारत ने अपने पहले ही प्रयास में सबसे कम लागत (₹450 करोड़) में मंगलयान-1 को मंगल की कक्षा में स्थापित कर वैश्विक कीर्तिमान बनाया था।
  • आदित्य-L1 भारत का पहला सूर्य मिशन है, जिसे पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर लैग्रेंज पॉइंट-1 (L1) पर सोलर कोरोना के अध्ययन के लिए स्थापित किया गया है।
  • गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन है जिसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 300-400 किमी की निचली कक्षा (LEO) में भेजा जाएगा और इसमें 'व्योममित्र' नामक हाफ-ह्यूमनॉइड रोबोटिक परीक्षण शामिल है।
  • इसरो की रॉकेट प्रणालियों में PSLV को 'वर्कहॉर्स' तथा भारी उपग्रहों को ले जाने वाले LVM3 रॉकेट को 'बाहुबली' कहा जाता है; इसमें जटिल स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग होता है।
  • भारत की भावी योजनाओं में चंद्रमा से नमूने वापस लाने वाला चंद्रयान-4 (LUPEX) मिशन तथा स्वयं का 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (BAS) स्थापित करना शामिल है।

इसरो (ISRO) का परिचय

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना 15 अगस्त 1969 को की गई थी। यह भारत सरकार के 'अंतरिक्ष विभाग' (Department of Space) के अंतर्गत संचालित होने वाली भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी है। भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापकीय विकास की परिकल्पना डॉ. विक्रम साराभाई (जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है) द्वारा की गई थी। इसके बाद डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रो. सतीश धवन और डॉ. के. कस्तूरीरंगन जैसे महान वैज्ञानिकों के कुशल नेतृत्व में इसरो ने तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल की। वर्तमान में इसरो का मुख्यालय बेंगलुरु, कर्नाटक में स्थित है तथा इसके प्रमुख प्रक्षेपण केंद्र 'सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र' (SDSC-SHAR), श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) में स्थित हैं।

चंद्रयान मिशन (Lunar Exploration Programme)

भारत का चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम (चंद्रयान शृंखला) चंद्रमा की उत्पत्ति, उसकी सतह की खनिज संरचना और वहाँ जल की उपस्थिति का अध्ययन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। भारत इस शृंखला के तहत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना है।

1. चंद्रयान-1 (2008) — भारत का प्रथम चंद्र मिशन

  • लॉन्च तिथि व प्रक्षेपण यान: 22 अक्टूबर 2008 को इसे PSLV-C11 रॉकेट द्वारा सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था।
  • मुख्य उद्देश्य: चंद्रमा की सतह का त्रि-आयामी (3D) एटलस तैयार करना तथा उसकी रासायनिक व खनिज संरचना का व्यापक मानचित्रण करना।
  • ऐतिहासिक उपलब्धि: चंद्रयान-1 के साथ भेजे गए 'मून इम्पैक्ट प्रोब' (MIP) ने चंद्रमा की सतह से टकराने से पूर्व वहाँ जल के अणुओं ($H_2O$) की उपस्थिति की खोज की, जिसकी पुष्टि नासा (NASA) के उपकरण 'मून मिनरलोलॉजी मैपर' ने भी की थी।
  • मिशन अवधि: इसने चंद्रमा के चारों ओर 3400 से अधिक चक्कर लगाए और तकनीकी खराबी के कारण 312 दिन (नियोजित 2 वर्ष के बजाय) तक सक्रिय रहकर महत्वपूर्ण डेटा भेजा।

2. चंद्रयान-2 (2019) — दक्षिणी ध्रुव का प्रथम प्रयास

  • लॉन्च तिथि व प्रक्षेपण यान: 22 जुलाई 2019 को इसे भारत के तत्कालीन सबसे शक्तिशाली रॉकेट GSLV Mk-III (LVM3-M1) द्वारा प्रक्षेपित किया गया था।
  • मुख्य घटक: इसमें एक ऑर्बिटर (Orbiter), एक लैंडर (जिसका नाम 'विक्रम' था) और एक रोवर (जिसका नाम 'प्रज्ञान' था) शामिल थे।
  • परिणाम व वर्तमान स्थिति: चंद्रमा के अज्ञात 'दक्षिणी ध्रुव' पर उतरने के दौरान सतह से मात्र 2.1 किमी की ऊँचाई पर लैंडर का ग्राउंड स्टेशन से संपर्क टूट गया, जिससे उसकी हार्ड लैंडिंग हुई। हालाँकि, इसका ऑर्बिटर पूर्णतः सफल रहा और वह आज भी चंद्रमा की कक्षा में सक्रिय रहकर उच्च रिज़ॉल्यूशन वाले वैज्ञानिक डेटा और तस्वीरें भेज रहा है।

3. चंद्रयान-3 (2023) — ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग

  • लॉन्च एवं लैंडिंग तिथियाँ: 14 जुलाई 2023 को लॉन्च किया गया तथा 23 अगस्त 2023 को शाम 06:04 बजे चंद्रमा की सतह पर उतरा। भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन (23 अगस्त) को प्रतिवर्ष 'राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस' (National Space Day) के रूप में मनाने की घोषणा की है।
  • प्रक्षेपण यान: इसे LVM3-M4 रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। इसके लैंडिंग स्थल को 'शिव शक्ति पॉइंट' (Shiv Shakti Point) नाम दिया गया है।
  • विश्व रिकॉर्ड: भारत चंद्रमा के दुर्गम और अत्यधिक ठंडे दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला देश बना। इसके साथ ही भारत, सोवियत संघ, अमेरिका और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का चौथा देश बन गया।
  • वैज्ञानिक निष्कर्ष: इसके लैंडर (Vikram) और रोवर (Pragyan) में लगे पेलोड्स (जैसे APXS और LIBS) ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की मिट्टी में सल्फर (S), एल्युमीनियम, कैल्शियम, आयरन, क्रोमियम और टाइटेनियम जैसी धातुओं की उपस्थिति की पुष्टि की तथा वहाँ के तापमान में तीव्र उतार-चढ़ाव दर्ज किया।

मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर मिशन - MOM)

1. मंगलयान-1 (2013) — अंतर्ग्रहीय मिशन में वैश्विक रिकॉर्ड

  • लॉन्च एवं कक्षा में प्रवेश: 5 नवंबर 2013 को PSLV-C25 द्वारा प्रक्षेपित किया गया और 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हुआ।
  • लागत व वैश्विक कीर्तिमान: इस मिशन की कुल लागत मात्र ₹450 करोड़ (लगभग 74 मिलियन डॉलर) थी, जो हॉलीवुड फिल्मों के बजट से भी कम थी। भारत अपने पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश और सोवियत संघ, नासा व यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद चौथा देश बना।
  • मिशन अवधि: मात्र 6 महीने के नियोजित जीवनकाल के लिए डिज़ाइन किया गया यह यान ईंधन की कुशल बचत के कारण 8 वर्षों से अधिक समय तक (अक्टूबर 2022 तक) मंगल की कक्षा में सक्रिय रहा और मंगल के वायुमंडल में मीथेन गैस की खोज व उसके उपग्रह 'फोबोस' की तस्वीरें भेजता रहा।

2. मंगलयान-2 (MOM-2) — भावी अंतर्ग्रहीय मिशन

  • मिशन रूपरेखा: यह इसरो का दूसरा मंगल अन्वेषण मिशन है, जिसके तहत अत्यधिक उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित एक हाइब्रिड आर्बिटर भेजा जा रहा है।
  • मुख्य उद्देश्य: मंगल ग्रह के वायुमंडल, आयनमंडल, वहां के चुंबकीय क्षेत्र और सतह की धूल भरी आंधियों का दीर्घकालिक और सूक्ष्म अध्ययन करना। इसमें मंगल की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए भविष्य में लैंडर/रोवर भेजने की तकनीक का विकास भी शामिल है।

आदित्य-L1 मिशन (Aditya-L1 Mission) — भारत का प्रथम सूर्य मिशन

  • लॉन्च तिथि व प्रक्षेपण यान: 2 सितंबर 2023 को इसे PSLV-C57 रॉकेट द्वारा सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था।
  • गंतव्य स्थल: पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित लैग्रेंज पॉइंट 1 (Lagrange Point 1 - L1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा (Halo Orbit) में स्थापित। इस बिंदु पर सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल संतुलित हो जाता है, जिससे उपग्रह बिना किसी ग्रहण या अवरोध के निरंतर सूर्य का अवलोकन कर सकता है।
  • वैज्ञानिक उद्देश्य व पेलोड: यह यान अपने साथ 7 स्वदेशी पेलोड (जैसे VELC, SUIT) ले गया है। इसका मुख्य कार्य सूर्य के बाह्य वायुमंडल अर्थात् सोलर कोरोना (Solar Corona) के अत्यधिक उच्च तापमान के रहस्यों, सौर हवाओं (Solar Winds), कोरोनल मास इजेक्शन (CME) और अंतरिक्ष के मौसम (Space Weather) पर सूर्य की गतिविधियों के प्रभावों का विस्तृत अध्ययन करना है।

गगनयान मिशन (Gaganyaan Mission) — भारत का मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम

गगनयान इसरो का सबसे महत्वाकांक्षी और देश का पहला स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन (Human Spaceflight Programme) है। इस मिशन का उद्देश्य भारत की स्वावलंबन क्षमता को प्रदर्शित करते हुए भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में सुरक्षित भेजना और वापस पृथ्वी पर लाना है।

मिशन की रूपरेखा एवं तकनीकी पैरामीटर्स:

  • चालक दल की योजना: इसके तहत भारतीय वायुसेना के विशेष रूप से चयनित चार जांबाज पायलटों (जिन्हें 'गगनौट्स' कहा जा रहा है) में से 2 या 3 अंतरिक्ष यात्रियों को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में भेजा जाएगा।
  • कक्षा और अवधि: अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की सतह से 300 से 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित कक्षा में स्थापित किया जाएगा, जहाँ वे 3 से 7 दिन व्यतीत करेंगे।
  • वापसी मॉड्यूल (Crew Module): मिशन की समाप्ति पर क्रू मॉड्यूल को सुरक्षित रूप से भारतीय समुद्री सीमा (अरब सागर या हिंद महासागर) में लैंड कराया जाएगा। इसके लिए विशेष 'क्रू एस्केप सिस्टम' (CES) विकसित किया गया है।

गगनयान मिशन के विभिन्न विकासात्मक चरण:

मिशन का चरण विशिष्ट विवरण एवं उद्देश्य वर्तमान तकनीकी प्रगति / स्थिति
TV-D1 (Test Vehicle Abort Mission) उड़ान के दौरान किसी खराबी की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों को बचाने वाले 'क्रू एस्केप सिस्टम' का हवा में सफल परीक्षण करना। सफलतापूर्वक पूर्ण। अक्टूबर 2023 में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसका सफल परीक्षण किया गया।
मानवरहित परीक्षण (G1 व G2) मुख्य मिशन से पूर्व बिना चालक दल के रोबोटिक फ्लाइट भेजना। इसमें इसरो द्वारा विकसित हाफ-ह्यूमनॉइड रोबोट 'व्योममित्र' (Vyommitra) को भेजा जा रहा है, जो मानव शरीर पर अंतरिक्ष के प्रभावों का डेटा रिकॉर्ड करेगी। परीक्षण उड़ानों और व्योममित्र रोबोटिक एकीकरण के उन्नत चरण अंतिम दौर में क्रियान्वित हैं।
मुख्य मानव मिशन (H1) भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (गगनौट्स) को भारत की धरती से स्वदेशी रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में भेजकर सुरक्षित वापस लाने का अंतिम ऐतिहासिक चरण। अंतरिक्ष यात्रियों का बेंगलुरु के एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग फैसिलिटी (ATF) में व्यापक शारीरिक, मानसिक और आपातकालीन सर्वाइवल प्रशिक्षण जारी है।

इसरो की प्रमुख रॉकेट प्रणालियां (Launch Vehicles)

इसरो ने उपग्रहों को विभिन्न कक्षाओं में स्थापित करने के लिए समय के साथ अत्यंत विश्वसनीय और शक्तिशाली लॉन्च व्हीकल्स का विकास किया है:

  • PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle): इसे 'इसरो का वर्कहॉर्स' (Workhorse of ISRO) कहा जाता है। यह चार चरणों वाला रॉकेट है, जिसमें बारी-बारी से ठोस (Solid) और तरल (Liquid) ईंधन का उपयोग किया जाता है। तरल चरण में प्रसिद्ध स्वदेशी 'विकास इंजन' (Vikas Engine) का प्रयोग होता है। इसने चंद्रयान-1, मंगलयान और एक ही रॉकेट से 104 उपग्रह लॉन्च करने का विश्व कीर्तिमान (फरवरी 2017) स्थापित किया था।
  • GSLV (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle): यह तीन चरणों वाला भारी रॉकेट है, जिसके तीसरे और अंतिम चरण में अत्यधिक जटिल स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic Engine) का उपयोग किया जाता है। क्रायोजेनिक इंजन में अत्यंत कम तापमान पर लिक्विड हाइड्रोजन (ईंधन) और लिक्विड ऑक्सीजन (ऑक्सीकारक) का प्रयोग होता है, जो भारी संचार उपग्रहों को 36,000 किमी ऊँची भू-स्थैतिक कक्षा (GEO) में स्थापित करने की शक्ति देता है।
  • LVM3 (Launch Vehicle Mark 3): इसे पूर्व में GSLV Mk-III कहा जाता था। यह इसरो का सबसे भारी और शक्तिशाली एक्टिव रॉकेट है, जिसे 'बाहुबली' भी कहा जाता है। यह 4000 किग्रा तक के उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में भेज सकता है। चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और गगनयान मिशन के लिए इसी रॉकेट का उपयोग तय किया गया है।
  • SSLV (Small Satellite Launch Vehicle): यह इसरो का नवीनतम लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान है। यह तीन चरणों वाला ठोस ईंधन आधारित रॉकेट है, जो मात्र 72 घंटे में असेंबल होकर 500 किग्रा तक के छोटे व्यावसायिक उपग्रहों को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित कर सकता है।

इसरो की भावी एवं दीर्घकालिक सामरिक योजनाएं

  • चंद्रयान-4 (LUPEX - Lunar Polar Exploration): यह इसरो और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी (JAXA) का एक संयुक्त चंद्र मिशन है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के स्थायी छाया वाले क्षेत्रों (Permanently Shadowed Regions) से मिट्टी और बर्फ के नमूने एकत्र करके उन्हें वापस पृथ्वी पर लाना (Sample Return Mission) है।
  • शुक्रयान-1 (Venus Orbiter Mission): शुक्र ग्रह के घने सल्फ्यूरिक अम्ल के बादलों वाले वायुमंडल, वहां की सतह के नीचे की भूगर्भीय संरचना और अत्यधिक तीव्र ग्रीनहाउस प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए नियोजित मिशन।
  • भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksha Station - BAS): भारत का अपना स्वतंत्र अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य। इसके प्रथम मॉड्यूल को लो अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने की योजना पर कार्य चल रहा है, जो पूर्ण रूप से मानव युक्त अनुसंधान केंद्र के रूप में कार्य करेगा।
  • निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का एकीकरण: इसरो अब व्यावसायिक और नियमित लॉन्चिंग के कार्य अपनी वाणिज्यिक शाखा 'न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड' (NSIL) और इन-स्पेस (IN-SPCE) के माध्यम से निजी भारतीय कंपनियों (जैसे स्काईरूट एयरोस्पेस, पिक्सल) को सौंप रहा है, ताकि इसरो खुद को केवल डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन (गहन अंतरिक्ष अनुसंधान) पर केंद्रित कर सके।
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