भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम एवं अनुसंधान संस्थान | RPSC 2026
Table of Contents
- भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का परिचय
- भारत का तीन चरणीय परमाणु कार्यक्रम
- 1. प्रथम चरण (First Stage) — दाबित भारी पानी रिएक्टर (PHWR)
- 2. द्वितीय चरण (Second Stage) — फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)
- 3. तृतीय चरण (Third Stage) — थोरियम आधारित रिएक्टर (Advanced Heavy Water Reactor)
- भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC)
- स्थापना, इतिहास एवं अवस्थिति:
- BARC के मुख्य वैज्ञानिक व सामरिक कार्य:
- प्रमुख परमाणु अनुसंधान एवं विकास केंद्र
- भारत के सर्वोच्च परमाणु संस्थान व नियामक ढांचा
- भारत के प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plants)
- परमाणु तकनीक के विविध एवं शांतिपूर्ण अनुप्रयोग
- 1. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में:
- 2. कृषि और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में:
- 3. औद्योगिक एवं भू-वैज्ञानिक क्षेत्र में:
- भारत की भावी परमाणु योजनाएं एवं लक्ष्य
Key Points
- भारत का तीन चरणीय परमाणु कार्यक्रम विश्व में अनूठा है, जो प्राकृतिक यूरेनियम से शुरू होकर थोरियम तक पहुंचता है
- BARC मुंबई में स्थित भारत का प्रमुख परमाणु अनुसंधान केंद्र है जो 1954 में स्थापित हुआ था
- भारत में वर्तमान में 23 परमाणु रिएक्टर संचालित हैं जो लगभग 6780 MW ऊर्जा उत्पादन करते हैं
- परमाणु तकनीक का उपयोग चिकित्सा, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से हो रहा है
- AERB परमाणु सुविधाओं की सुरक्षा और नियंत्रण का कार्य करता है
- भारत में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1948 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में हुई थी।
- भारत का परमाणु कार्यक्रम अनूठी तीन-चरणीय रणनीति पर आधारित है, जिसका अंतिम लक्ष्य देश के प्रचुर थोरियम भंडारों का उपयोग करना है।
- प्रथम चरण में प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन व भारी पानी ($D_2O$) मंदक के रूप में प्रयुक्त होता है, जबकि द्वितीय चरण फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) तकनीक पर आधारित है।
- भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) मुंबई के ट्रॉम्बे में स्थित है, जो देश का मुख्य परमाणु अनुसंधान संस्थान है।
- इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) कलपक्कम (तमिलनाडु) में फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के विकास के लिए कार्यरत है।
- परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) देश की सर्वोच्च परमाणु नीति निर्माता संस्था है, जिसके पदेन अध्यक्ष सीधे प्रधानमंत्री के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करते हैं।
- तारापुर (महाराष्ट्र) भारत का पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जबकि कुडनकुलम (तमिलनाडु) रूस के सहयोग से स्थापित देश का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा स्टेशन है।
भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का परिचय
भारत में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1948 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा के दूरदर्शी नेतृत्व में हुई थी। डॉ. भाभा को 'भारत के परमाणु कार्यक्रम का जनक' कहा जाता है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए परमाणु तकनीक का शांतिपूर्ण और रचनात्मक उपयोग (जैसे विद्युत उत्पादन, चिकित्सा और कृषि) करना था। भारत ने बाह्य देशों से यूरेनियम आयात की निर्भरता को कम करने और देश में उपलब्ध प्रचुर थोरियम संसाधनों का दोहन करने के लिए एक विशिष्ट तीन-चरणीय रणनीति विकसित की, जो वैश्विक स्तर पर अपनी तरह का अनूठा मॉडल है।
भारत का तीन चरणीय परमाणु कार्यक्रम
भारत में प्राकृतिक यूरेनियम के सीमित भंडार हैं, लेकिन विश्व के कुल थोरियम भंडार का लगभग 25% हिस्सा भारत (मुख्य रूप से केरल और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों की मोनोपॉजिट सैंड/रेत) में पाया जाता है। थोरियम को सीधे ईंधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता, इसलिए डॉ. भाभा ने निम्नलिखित तीन चरणों की कूटनीति तैयार की:
1. प्रथम चरण (First Stage) — दाबित भारी पानी रिएक्टर (PHWR)
- ईंधन एवं मंदक: इस चरण में ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम (Uranium-235 व Uranium-238) का उपयोग किया जाता है। रिएक्टर को ठंडा रखने और न्यूट्रॉन की गति को धीमा करने के लिए मंदक (Moderator) के रूप में भारी पानी (Heavy Water - $D_2O$) का प्रयोग किया जाता है।
- महत्वपूर्ण उप-उत्पाद: इस चरण में विद्युत उत्पादन के साथ-साथ प्राकृतिक यूरेनियम-238 न्यूट्रॉन को अवशोषित करके प्लूटोनियम-239 ($^{239}\text{Pu}$) में परिवर्तित हो जाता है, जो द्वितीय चरण के लिए मुख्य ईंधन का कार्य करता है।
2. द्वितीय चरण (Second Stage) — फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)
- तकनीकी विशेषता: इस चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (Fast Breeder Reactor) तकनीक का उपयोग किया जाता है। 'ब्रीडर' का अर्थ है कि यह रिएक्टर जितना ईंधन खर्च करता है, उससे अधिक नए ईंधन का निर्माण (Breeding) कर देता है।
- ईंधन व शीतलक: इसमें प्रथम चरण से प्राप्त प्लूटोनियम-239 और यूरेनियम-238 के मिश्रण (MOX ईंधन) का उपयोग किया जाता है। इसमें मंदक की आवश्यकता नहीं होती और शीतलक (Coolant) के रूप में द्रवित सोडियम (Liquid Sodium) का प्रयोग किया जाता है।
- थोरियम का एकीकरण: इस चरण के अंतिम दौर में रिएक्टर के चारों ओर थोरियम-232 का कंबल (Blanket) रखा जाता है, जो न्यूट्रॉन की बौछार से यूरेनियम-233 ($^{233}\text{U}$) में बदल जाता है। कलपक्कम में स्थित 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) इसी चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
3. तृतीय चरण (Third Stage) — थोरियम आधारित रिएक्टर (Advanced Heavy Water Reactor)
- ईंधन प्रणाली: यह भारत के परमाणु कार्यक्रम का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है। इसमें द्वितीय चरण से प्राप्त यूरेनियम-233 ($^{233}\text{U}$) और देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम-232 ($^{232}\text{Th}$) के मिश्रण को मुख्य ईंधन के रूप में उपयोग किया जाएगा।
- सामरिक लाभ: एक बार यह चरण पूर्णतः क्रियान्वित होने पर भारत को बिजली उत्पादन के लिए किसी भी अन्य देश से यूरेनियम आयात करने की आवश्यकता नहीं रहेगी और देश हजारों वर्षों के लिए ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जाएगा। वर्तमान में स्वदेशी 'एडवांस्ड हैवी वाटर रिएक्टर' (AHWR) का विकास इसी चरण के अनुसंधान का हिस्सा है।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC)
स्थापना, इतिहास एवं अवस्थिति:
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) भारत का प्रमुख और अग्रणी परमाणु अनुसंधान संस्थान है। इसकी स्थापना 3 जनवरी 1954 को मुंबई के ट्राम्बे में की गई थी। प्रारंभ में इसे 'परमाणु ऊर्जा स्थापना ट्राम्बे' (AEET) के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1966 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा के आकस्मिक निधन के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा वर्ष 1967 में संस्थान का नाम बदलकर उनके सम्मान में 'भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र' (BARC) कर दिया गया।
BARC के मुख्य वैज्ञानिक व सामरिक कार्य:
- रिएक्टरों का डिजाइन: भारत के अनुसंधान रिएक्टरों (जैसे अप्सरा - भारत का पहला अनुसंधान रिएक्टर, साइरस, जरलीना और ध्रुव) का स्वदेशी डिजाइन और निर्माण करना।
- ईंधन चक्र तकनीक: परमाणु ईंधन का प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण (Reprocessing) और समृद्ध यूरेनियम की उत्पादन तकनीकों का विकास।
- रेडियोआइसोटोप उत्पादन: चिकित्सा, कृषि और उद्योगों के लिए आवश्यक रेडियोआइसोटोप्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना।
- परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन: प्रयुक्त परमाणु ईंधन से निकलने वाले उच्च-स्तरीय रेडियोधर्मी कचरे का सुरक्षित स्थिरीकरण (Vitrification) और दीर्घकालिक अपशिष्ट प्रबंधन करना।
प्रमुख परमाणु अनुसंधान एवं विकास केंद्र
परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अंतर्गत अनुसंधान और तकनीकी विकास को गति देने के लिए देश में निम्नलिखित स्वायत्त और विशिष्ट केंद्र कार्यरत हैं:
- इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR): यह कलपक्कम, तमिलनाडु में स्थित है, जिसकी स्थापना वर्ष 1971 में हुई थी। इसका मुख्य कार्य फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) और लिक्विड सोडियम तकनीक से संबंधित संपूर्ण अनुसंधान और विकास (R&D) का संचालन करना है।
- राजा रमन्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र (RRCAT): यह इंदौर, मध्य प्रदेश में स्थित है, जिसकी स्थापना वर्ष 1984 में की गई थी। यह केंद्र मुख्य रूप से गैर-नाभिकीय उन्नत फ्रंटियर्स जैसे कि लेजर तकनीक (Laser Technology), कण त्वरक (Particle Accelerators) और सिंक्रोट्रॉन विकिरण स्रोतों के विकास पर कार्य करता है।
- परिवर्ती ऊर्जा साइक्लोट्रॉन केंद्र (VECC): यह कोलकाता, पश्चिम बंगाल में स्थित है, जो परमाणु भौतिकी, न्यूक्लियर मेडिसिन और उन्नत साइक्लोट्रॉन एक्सीलरेटर्स के क्षेत्र में अनुसंधान का अग्रणी केंद्र है।
- परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय (AMD): इसका मुख्यालय हैदराबाद, तेलंगाना में है। इसका मुख्य कार्य संपूर्ण देश में यूरेनियम, थोरियम, जिरकोनियम और अन्य दुर्लभ परमाणु खनिजों की खोज के लिए भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्वेषण करना है।
भारत के सर्वोच्च परमाणु संस्थान व नियामक ढांचा
- परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC - Atomic Energy Commission): इसकी स्थापना 10 अगस्त 1948 को की गई थी। यह भारत में परमाणु गतिविधियों और नीतियों को तैयार करने वाली देश की सर्वोच्च नीति-निर्माता संस्था है। भारत के प्रधानमंत्री इस आयोग के प्रशासनिक नियंत्रण को सीधे देखते हैं तथा इसके अध्यक्ष सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं।
- परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE - Department of Space & Atomic Energy): इसकी स्थापना वर्ष 1954 में की गई थी। यह सीधे प्रधानमंत्री के पोर्टफोलियो के अधीन कार्य करने वाला मुख्य प्रशासनिक विभाग है, जो AEC की नीतियों को धरातल पर लागू करता है तथा सभी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों व अनुसंधान केंद्रों का संचालन करता है।
- परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB - Atomic Energy Regulatory Board): इसकी स्थापना 15 नवंबर 1983 को परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के तहत की गई थी। इसका मुख्य कार्य देश में परमाणु और विकिरण सुविधाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना, पर्यावरण पर रेडियोधर्मी प्रभावों की निगरानी करना तथा सुरक्षा मानकों के अनुरूप संयंत्रों को परिचालन लाइसेंस प्रदान करना है। इसका मुख्यालय मुंबई में है।
भारत के प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plants)
भारत में व्यावसायिक परमाणु विद्युत उत्पादन का प्रबंधन पूर्णतः सरकारी उपक्रम न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) द्वारा किया जाता है। वर्तमान में देश में कार्यरत प्रमुख परिचालन संयंत्रों का विवरण इस प्रकार है:
| संयंत्र का नाम | भौगोलिक स्थिति (राज्य) | स्थापना वर्ष | रिएक्टर का प्रकार व विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन (TARAPUR) | महाराष्ट्र | 1969 | भारत का पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र। इसके प्रारंभिक दो रिएक्टर 'उबलते पानी के रिएक्टर' (BWR) थे जो अमेरिका के सहयोग से स्थापित हुए थे। वर्तमान क्षमता 1400 MW है। |
| राजस्थान परमाणु ऊर्जा स्टेशन (RAPS) | रावतभाटा, राजस्थान | 1973 | कनाडा के सहयोग से स्थापित भारत का पहला दाबित भारी पानी रिएक्टर (PHWR) संयंत्र। यह चम्बल नदी के निकट स्थित है। |
| मद्रास परमाणु ऊर्जा स्टेशन (MAPS) | कलपक्कम, तमिलनाडु | 1984 | भारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से निर्मित व्यावसायिक परमाणु संयंत्र। |
| नरौरा परमाणु ऊर्जा स्टेशन (NAPS) | बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश | 1991 | गंगा नदी के तट पर स्थित। यह संयंत्र भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा मानकों के विशेष अपग्रेड के साथ संचालित है। |
| काकरापार परमाणु ऊर्जा स्टेशन (KAPS) | तापी, गुजरात | 1993 | हाल ही में यहाँ भारत के पहले स्वदेशी 700 मेगावाट क्षमता वाले PHWR रिएक्टर का सफल व्यावसायिक परिचालन प्रारंभ किया गया है। |
| कैगा परमाणु ऊर्जा स्टेशन (KGS) | उत्तर कन्नड़, कर्नाटक | 2000 | इसके एक रिएक्टर ने लगातार 941 दिनों तक निर्बाध रूप से परिचालन का वैश्विक रिकॉर्ड बनाया है। |
| कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा स्टेशन (KKNPP) | तिरुनेलवेली, तमिलनाडु | 2013 | भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र। यह रूस के तकनीकी सहयोग से स्थापित 1000-1000 मेगावाट के उन्नत VVER (लाइट वाटर) रिएक्टरों से सुसज्जित है। |
परमाणु तकनीक के विविध एवं शांतिपूर्ण अनुप्रयोग
1. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में:
- कैंसर का उपचार (Radiotherapy): कोबाल्ट-60 ($^{60}\text{Co}$) रेडियोआइसोटोप से निकलने वाली गामा किरणों का उपयोग ट्यूमर और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में किया जाता है।
- थायरॉइड विकार उपचार: आयोडीन-131 ($^{131}\text{I}$) का उपयोग थायरॉइड ग्रंथि के विकारों और कैंसर की जाँच व उपचार में होता है।
- मेडिकल इमेजिंग: टेक्नीशियन-99m का उपयोग मानव शरीर के आंतरिक अंगों के त्रि-आयामी स्कैनिंग और डायग्नोस्टिक्स में व्यापक रूप से किया जाता है।
2. कृषि और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में:
- फसल उत्परिवर्तन (Crop Mutation): BARC द्वारा गामा विकिरणों का उपयोग करके मूंगफली, चावल और दालों की उच्च उपज वाली तथा रोग-प्रतिरोधी प्रजातियां (जैसे 'ट्रॉम्बे प्रजातियां') विकसित की गई हैं।
- खाद्य संरक्षण (Food Irradiation): प्याज, आलू और मसालों पर नियंत्रित मात्रा में गामा किरणों की बौछार की जाती है, जिससे उनमें अंकुरण रुक जाता है, सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और उनकी शेल्फ-लाइफ (भंडारण अवधि) बढ़ जाती है।
3. औद्योगिक एवं भू-वैज्ञानिक क्षेत्र में:
- गैर-विनाशकारी परीक्षण (NDT): औद्योगिक पाइपलाइनों, विमानों के पंखों और वेल्डिंग के जोड़ों में आंतरिक दरारें जाँचने के लिए रेडियोग्राफी तकनीक का उपयोग।
- हाइड्रोलोजी (भूजल खोज): ट्रिटियम और अन्य आइसोटोप्स का उपयोग करके भूमिगत जल के प्रवाह, स्रोतों और बांधों में होने वाले रिसाव का सटीक पता लगाया जाता है।
भारत की भावी परमाणु योजनाएं एवं लक्ष्य
भारत सरकार ने कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम करने और नेट-ज़ीरो (Net-Zero) लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए परमाणु ऊर्जा क्षमता को तीव्र गति से बढ़ाने का रणनीतिक लक्ष्य रखा है। सरकार ने वर्ष 2031-32 तक देश की स्थापित परमाणु क्षमता को वर्तमान से बढ़ाकर 22,480 मेगावाट (MW) करने की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की है। इसके तहत गोरखपुर (हरियाणा), चुटका (मध्य प्रदेश), माही बजाज सागर (राजस्थान) और जैतापुर (महाराष्ट्र - फ्रांस के सहयोग से प्रस्तावित विश्व का सबसे बड़ा एकल साइट संयंत्र) में फ्लीट-मोड (Fleet Mode) के अंतर्गत नए परमाणु रिएक्टरों की स्थापना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की प्रक्रियाओं पर तीव्र गति से कार्य किया जा रहा है।