My Cart
Your Cart 0

    Your cart is empty.

  • Total (Amount) ₹0.00
Topics
मानव शरीर के प्रमुख अंग तंत्र (पाचन... विटामिन्स एवं खनिज: रासायनिक नाम, स... मानव रोग एवं उनके उत्तरदायी कारक (व... आनुवंशिकी (Genetics), DNA एवं RNA स... Title: पादप आकारिकी (Plant Morpholo... न्यूटन के गति के नियम (Newton's Law... प्रकाश की प्रकृति, परावर्तन, अपवर्त... ध्वनी का सिद्धांत: तरंग गति, डॉपलर... आधुनिक आवर्त सारणी (Modern Periodic... प्रमुख रासायनिक यौगिकों के व्यापारि... दैनिक जीवन में रसायन: अम्ल, क्षार,... भारत के मिसाइल सिस्टम एवं रक्षा प्र... इसरो (ISRO) के अंतरिक्ष मिशन एवं अं... भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम एवं... अंतर्राष्ट्रीय रक्षा समझौते, प्रमुख... ओजोन परत क्षरण: कारण, प्रभाव और मॉन... जलवायु परिवर्तन (Climate Change): प... अल नीनो (El Niño) एवं ला नीना (La N...

मानव रोग एवं उनके उत्तरदायी कारक (विषाणु, जीवाणु, प्रोटोजोआ, कवक और आनुवंशिक रोग)

1 min read 49 views 06 Jul 2026 General Science
मानव रोगों के विभिन्न कारकों जैसे विषाणु, जीवाणु, प्रोटोजोआ, कवक और आनुवंशिक कारकों की विस्तृत जानकारी।
Key Points
  • मानव रोग पांच मुख्य कारकों से होते हैं: विषाणु, जीवाणु, प्रोटोजोआ, कवक और आनुवंशिक कारक
  • विषाणुजनित रोगों में COVID-19, डेंगू, इन्फ्लूएंजा और पोलियो प्रमुख हैं
  • जीवाणुजनित रोगों में तपेदिक, निमोनिया, हैजा और टाइफाइड शामिल हैं
  • प्रोटोजोआजनित रोगों में मलेरिया सबसे घातक है जो प्लाज्मोडियम परजीवी से होता है
  • आनुवंशिक रोग जैसे डाउन सिंड्रोम, हीमोफीलिया और सिकल सेल एनीमिया जन्म से ही होते हैं

मानव रोग एवं उनके कारक

मानव शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं जो जैविक, रासायनिक या आनुवंशिक कारकों के कारण होते हैं। रोगाणुओं और शारीरिक विकृतियों के आधार पर इन कारकों को मुख्यतः पांच श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: विषाणु (वायरस), जीवाणु (बैक्टीरिया), प्रोटोजोआ, कवक (फंगस) और आनुवंशिक कारक। प्रतियोगी परीक्षाओं (RPSC, UPSC, BPSC) के दृष्टिकोण से इन रोगों के वैज्ञानिक नाम, वाहक और प्रभावित अंगों से संबंधित प्रश्न निरंतर पूछे जाते हैं।

विषाणुजनित रोग (Viral Diseases)

विषाणु (Virus) अतिसूक्ष्म, अकोशकीय और न्यूक्लियोप्रोटीन कण हैं जो केवल जीवित होस्ट कोशिकाओं (Host Cells) के भीतर ही गुणन कर सकते हैं। इनमें आनुवंशिक पदार्थ के रूप में या तो DNA पाया जाता है या RNA (दोनों एक साथ कभी नहीं पाए जाते)।

मुख्य विषाणुजनित रोग एवं उनके विशिष्ट लक्षण:

  • इन्फ्लूएंजा (फ्लू): यह इन्फ्लूएंजा वायरस (Myxovirus influenzae) के कारण होता है। इसके लक्षणों में तीव्र ज्वर, बदन दर्द, खांसी और श्वसन तंत्र में सूजन शामिल हैं।
  • सामान्य सर्दी-जुकाम: मुख्य रूप से राइनोवायरस (Rhinovirus) के कारण होने वाला अत्यधिक संक्रामक रोग है, जो ऊपरी श्वसन मार्ग को प्रभावित करता है।
  • COVID-19: यह SARS-CoV-2 (Severe Acute Respiratory Syndrome Coronavirus 2) वायरस के कारण होता है, जो श्वसन तंत्र और फेफड़ों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करता है।
  • डेंगू (Dengue): इसे 'हड्डी तोड़ बुखार' भी कहते हैं। यह अर्बोवायरस समूह के डेंगू वायरस द्वारा होता है, जिसका संचरण मादा एडीज इजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छर के काटने से होता है। इसमें रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से गिरती है।
  • चिकनगुनिया: चिकनगुनिया वायरस (CHIKV) द्वारा होने वाला रोग है, जो एडीज मच्छर द्वारा ही फैलता है। इसमें जोड़ों में तीव्र और दीर्घकालिक दर्द होता है।
  • पोलियो (Poliomyelitis): पोलियोवायरस के कारण होता है, जो दूषित जल और भोजन द्वारा फैलता है। यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मेरुदंड की प्रेरक तंत्रिकाओं) को नष्ट कर देता है, जिससे पक्षाघात (पैरेलिसिस) हो जाता है।
  • हेपेटाइटिस (A, B, C): यह यकृत (Liver) को प्रभावित करने वाला रोग है। हेपेटाइटिस-B एक DNA वायरस है जो रक्त आधान और लैंगिक संपर्कों द्वारा संचरित होता है, जिससे लीवर सिरोसिस हो सकता है।
  • एड्स (AIDS): Acquired Immuno Deficiency Syndrome, जो HIV (Human Immunodeficiency Virus) नामक रेट्रोवायरस से होता है। यह शरीर की हेल्पर T-लिम्फोसाइट्स कोशिकाओं को नष्ट कर प्रतिरक्षा प्रणाली को पूर्णतः ध्वस्त कर देता है। इसकी जाँच के लिए एलिसा (ELISA) टेस्ट किया जाता है।

जीवाणुजनित रोग (Bacterial Diseases)

जीवाणु (Bacteria) एककोशकीय, प्रोकैरियोटिक जीव हैं। मानव शरीर में संक्रमण फैलाने वाले जीवाणु विशिष्ट टॉक्सिन्स (Toxins) उत्सर्जित करते हैं, जिससे कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।

मुख्य जीवाणुजनित रोग एवं उनके वैज्ञानिक कारक:

  • तपेदिक / क्षय रोग (TB): यह माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) नामक जीवाणु के कारण होता है। यह फेफड़ों, हड्डियों आदि को प्रभावित करता है। इसके उपचार के लिए DOTS (Directly Observed Treatment Short-course) प्रणाली और शिशुओं को BCG का टीका लगाया जाता है।
  • निमोनिया (Pneumonia): यह स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी (Streptococcus pneumoniae) या हीमोफिलस इन्फ्लुएंजी जीवाणु के कारण होता है। इसमें फेफड़ों के वायुकोशों (Alveoli) में तरल भर जाता है, जिससे श्वसन में तीव्र कठिनाई होती है।
  • हैजा (Cholera): यह दूषित जल और मक्खियों द्वारा फैलने वाला रोग है, जो विब्रियो कॉलेरी (Vibriocholerae) जीवाणु के कारण होता है। तीव्र दस्त और उल्टी के कारण शरीर में निर्जलीकरण (Dehydration) हो जाता है, जिसके उपचार हेतु ORS का घोल दिया जाता है।
  • टाइफाइड (मियादी बुखार): यह साल्मोनेला टाइफी (Salmonella typhi) जीवाणु से होने वाला आंतों का संक्रमण है, जो दूषित भोजन व जल से फैलता है। इसकी पुष्टि के लिए विडाल टेस्ट (Widal Test) किया जाता है।
  • डिप्थीरिया: यह कोरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरी (Corynebacterium diphtheriae) द्वारा होता है। इसमें गले में एक कृत्रिम झिल्ली बन जाती है जिससे दम घुटने लगता है। इससे बचाव के लिए बच्चों को DPT का टीका लगाया जाता है।
  • कुष्ठ रोग (Hansen's Disease): यह माइकोबैक्टीरियम लेप्री (Mycobacterium leprae) के कारण होता है। यह त्वचा और परिधीय तंत्रिकाओं को प्रभावित करता है, जिससे संवेदना समाप्त होने लगती है। इसके उपचार हेतु MDT (Multi-Drug Therapy) दी जाती है।
  • प्लेग (Black Death): यह यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) जीवाणु के कारण होता है। इसका संचरण चूहों पर पाए जाने वाले पिस्सू (Xenopsylla cheopis) के काटने से होता है।

प्रोटोजोआजनित रोग (Protozoal Diseases)

प्रोटोजोआ एककोशकीय, यूकैरियोटिक जीव हैं जो मानव शरीर के अंगों, रक्त या आंतों में परजीवी (Parasites) के रूप में रहकर गंभीर बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं।

मुख्य प्रोटोजोआजनित रोग एवं परजीवी:

  • मलेरिया (Malaria): यह प्लाज्मोडियम (Plasmodium) परजीवी के कारण होता है, जिसकी चार प्रमुख प्रजातियाँ हैं: P. vivax, P. falciparum (सबसे घातक/मस्तिष्क मलेरिया का कारण), P. malariae, और P. ovale। इस रोग का वाहक मादा एनोफिलीज (Anopheles) मच्छर है। यह आरबीसी (RBC) और प्लीहा (Spleen) को नष्ट करता है। इसके उपचार में कुनैन व क्लोरोक्विन औषधियां प्रयुक्त होती हैं।
  • अमीबियासिस (अमीबी पेचिश): यह एंटअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolytica) के कारण बड़ी आंत में होने वाला संक्रमण है, जिससे मल के साथ रक्त और श्लेष्मा (Mucus) आता है।
  • कालाजार (Leishmaniasis): यह लीशमानिया डोनोवानी (Leishmania donovani) परजीवी के कारण होता है, जिसका वाहक बालू मक्खी (Sandfly) है। यह प्लीहा, यकृत और अस्थि मज्जा को प्रभावित करता है।
  • सोने की बीमारी (Sleeping Sickness): यह ट्रिपैनोसोमा (Trypanosoma) परजीवी के कारण होता है, जिसका वाहक सीसी मक्खी (Tsetse fly) है। यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है जिससे रोगी को तीव्र नींद और सुस्ती आती है।
  • पायरिया (Pyorrhea): यह एंटअमीबा जिंजिवेलिस (Entamoeba gingivalis) के कारण मसूड़ों में होने वाला रोग है, जिससे मसूड़ों से मवाद और रक्त आता है तथा मुँह से दुर्गंध आती है।

कवकजनित रोग (Fungal Diseases)

कवक (Fungus) पर्णहरित रहित, यूकैरियोटिक जीव हैं। ये मुख्य रूप से मानव शरीर के बाह्य अंगों, त्वचा, बाल और नाखूनों में केराटिन प्रोटीन का भक्षण कर संक्रमण (Mycosis) फैलाते हैं।

मुख्य कवकजनित रोग एवं कारक:

  • दाद (Ringworm): त्वचा पर लाल, गोलाकार और खुजलीदार चकत्ते होना। यह मुख्य रूप से ट्राइकोफाइटन (Trichophyton), माइक्रोस्पोरम और एपिडर्मोफाइटन कवकों के कारण होता है।
  • एथलीट फुट (Athlete's Foot): पैरों की त्वचा का फटना और घाव होना। यह टीनिया पेडिस (Tinea pedis) या ट्राइकोफाइटन रब्रम नामक कवक से होता है, जो नम स्थानों से फैलता है।
  • कैंडिडिएसिस (Thrush): यह कैंडिडा अल्बिकैंस (Candida albicans) कवक द्वारा मुँह, गले या जननांगों की श्लेष्मा झिल्ली पर होने वाला सफेद पैच युक्त संक्रमण है।
  • गंजापन (Baldness): सिर के बालों का गिरना। यह टीनिया कैपिटिस (Tinea capitis) नामक कवक के कारण होता है जो बालों की जड़ों को नष्ट कर देता है।
  • दमा / अस्थमा (Asthma): फेफड़ों की श्वसन नलिकाओं में कवकों के बीजाणुओं द्वारा अवरोध उत्पन्न होना। यह मुख्य रूप से एस्परजिलस फ्यूमिगेट्स (Aspergillus fumigatus) कवक के कारण होता है।

आनुवंशिक रोग (Genetic Diseases)

आनुवंशिक रोग जीनों में उत्परिवर्तन (Mutation), गुणसूत्रों (Chromosomes) की संख्या में कमी या वृद्धि अथवा उनकी संरचनात्मक असामान्यताओं के कारण होते हैं। ये जन्मजात होते हैं तथा माता-पिता से संतानों में वंशागत होते हैं।

मुख्य आनुवंशिक रोग एवं गुणसूत्रीय कारण:

रोग का नाम विशिष्ट आनुवंशिक कारण मुख्य शारीरिक व मानसिक लक्षण
डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) 21वें जोड़ी गुणसूत्र की त्रिसूत्रता (Trisomy) अर्थात् एक अतिरिक्त प्रति का होना (कुल 47 गुणसूत्र)। इसे 'मंगोलिज़्म' भी कहते हैं। मानसिक मंदता, छोटा कद, खुला मुँह, झुर्रीदार जीभ और विशिष्ट मंगोलियाई चेहरा।
हीमोफीलिया (Hemophilia) यह एक X-सहलग्न अप्रभावी (X-linked Recessive) विकार है। इसे 'शाही बीमारी' (Royal Disease) भी कहा जाता है। रक्त का थक्का बनाने वाले कारकों (जैसे- कारक VIII या IX) की कमी से चोट लगने पर रक्त का थक्का नहीं जमता और निरंतर रक्तस्राव होता है। इसकी वाहक महिलाएँ होती हैं।
वर्णांधता (Color Blindness) यह भी एक X-सहलग्न (X-linked) आनुवंशिक दोष है, जो आँखों के रेटिना की शंकु कोशिकाओं (Cone Cells) को प्रभावित करता है। रोगी लाल और हरे रंग (Red and Green Color) के बीच अंतर पहचानने में पूर्णतः असमर्थ होता है। इसमें भी महिलाएँ वाहक और पुरुष मुख्य रूप से ग्रसित होते हैं।
सिकल सेल एनीमिया ऑटोसोमल अप्रभावी जीन में उत्परिवर्तन, जिससे हीमोग्लोबिन की बीटा श्रृंखला में ग्लूटामिक अम्ल के स्थान पर वैलीन एमिनो अम्ल आ जाता है। ऑक्सीजन की कमी होने पर लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) हँसिए के आकार (Sickle shaped) की हो जाती हैं, जिससे वे नष्ट होने लगती हैं और तीव्र एनीमिया होता है।
थैलेसीमिया (Thalassemia) हीमोग्लोबिन की ग्लोबिन श्रृंखला (अल्फा या बीटा) के संश्लेषण की दर में कमी आने के कारण होने वाला दोष। शरीर में अत्यधिक और दोषपूर्ण RBC निर्माण के कारण गंभीर एनीमिया होता है। रोगी को बार-बार बाहरी रक्त आधान (Blood Transfusion) की आवश्यकता पड़ती है।
क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम पुरुषों में एक अतिरिक्त X गुणसूत्र का आ जाना (44 + XXY = 47 गुणसूत्र)। लंबे पैर, अल्पविकसित जननांग, पुरुषों में स्तनों का विकास (Gynaecomastia) तथा ये पुरुष नपुंसक (Sterile) होते हैं।
टर्नर सिंड्रोम (Turner's) महिलाओं में एक X गुणसूत्र की कमी (44 + XO = 45 गुणसूत्र)। गुणसूत्रीय मोनोसोमी का उदाहरण। अल्पविकसित अंडाशय, छोटा कद, वेब्ड गर्दन और ये महिलाएँ बांझ होती हैं।

रोगों की रोकथाम और नियंत्रण

सामान्य सावधानियां:

  • व्यक्तिगत एवं पर्यावरणीय स्वच्छता: हाथों की नियमित सफाई, खुले में शौच न करना और मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिए पानी को एकत्र न होने देना।
  • सुरक्षित खान-पान: शुद्ध पेयजल (उबला हुआ या फिल्टर) का उपयोग तथा ढका हुआ व स्वच्छ भोजन करना ताकि आंत्र संक्रमण (हैजा, टाइफाइड) से बचा जा सके।
  • सार्वभौमिक टीकाकरण (Immunization): मिशन इंद्रधनुष जैसी राष्ट्रीय योजनाओं के तहत बच्चों को पोलियो, डीपीटी, हेपेटाइटिस-बी, खसरा और टीबी के टीकों का समय पर कवरेज देना।
  • वेक्टर नियंत्रण: मच्छर जनित रोगों (मलेरिया, डेंगू) से बचाव के लिए मच्छरदानियों का प्रयोग, जलाशयों में गैम्बूसिया (Gambusia) मछली छोड़ना (जो मच्छरों के लार्वों को खाती है) तथा कीटनाशकों का छिड़काव।

विशिष्ट चिकित्सकीय बचाव एवं उपचार:

  • विषाणुजनित रोगों से बचाव: इनके खिलाफ एंटीबायोटिक्स कार्य नहीं करती हैं, अतः बचाव ही उपचार है (टीकाकरण)। एड्स और कोविड जैसी गंभीर बीमारियों के लिए एंटीरेट्रोवाइरल या एंटीवायरल औषधियों का प्रयोग डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में किया जाता है।
  • जीवाणुजनित रोगों से बचाव: जीवाणु संक्रमण के उपचार हेतु विशिष्ट **एंटीबायोटिक्स (जैसे- पेनिसिलिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन)** का प्रयोग किया जाता है। एंटीबायोटिक का कोर्स हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार पूरा करना चाहिए ताकि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Resistence) की समस्या उत्पन्न न हो।
  • प्रोटोजोआ एवं कवक जनित रोगों से बचाव: एंटीप्रोटोजोअल दवाओं (जैसे क्लोरोक्विन) और एंटीफंगल क्रीम/दवाओं (जैसे कीटोकोनाजोल, क्लोट्रिमाजोल) का प्रयोग। त्वचा को हमेशा सूखा और साफ रखना कवक संक्रमण से बचने का सर्वोत्तम उपाय है।
  • आनुवंशिक रोगों से बचाव: चूंकि ये जन्मजात होते हैं, अतः इनका कोई स्थायी उपचार (जीन थेरेपी के विकास के स्तर को छोड़कर) उपलब्ध नहीं है। विवाह से पूर्व और गर्भावस्था के दौरान **जेनेटिक काउंसलिंग (Genetic Counseling)** तथा गुणसूत्रीय स्क्रीनिंग (जैसे एम्नियोसेंटेसिस) द्वारा इनकी पहचान की जा सकती है।
Share: WhatsApp Telegram
ExamWise App
Facebook WhatsApp Support